शनिवार, 15 मई 2010

एक ग़ज़ल 011 : यहाँ लोगो की आँखों में .....

बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन
1222     ------1222---------1222---------1222
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ग़ज़ल 011-ओके

यहाँ लोगों की आँखों में नमी मालूम होती है |
नदी इक दर्द की जैसे रुकी मालूम होती है |

हज़ारों मर्तबा दिल खोल कर बातें कही अपनी,
मगर हर बार बातों में कमी मालूम होती है |

चलो रिश्ते पुराने फिर से अपने गर्म कर आएं ,
दुबारा बर्फ की चादर तनी मालूम होती है |

दरीचे खोल कर देखो कहाँ तक धूप चढ़ आई,
हवा इस बन्द कमरे की थमी मालूम होती है |

हमारे हक़ में जो आता है कोई लूट लेता है,
सदाक़त में भी अब तो रहज़नी मालूम होती है |

तुम्हारी "फ़ाइलों" में क़ैद मेरी ’रोटियां’ सपने,
मेरी आवाज़ "संसद" में ठगी मालूम होती है |

उमीद-ओ-हौसला,हिम्मत अभी मत छोड़ना "आनन"
सियाही रात में कुछ रोशनी मालूम होती है

-आनन्द पाठक ’आनन’-







रविवार, 2 मई 2010

एक ग़ज़ल 010 : रकीबों से क्या आप ......

बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन---फ़ऊलुन---फ़ऊलुन--फ़ऊलुन
122--------122--------122----------122
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 ग़ज़ल 010--ओके

रक़ीबों से क्या कुछ वो फ़रमा रहे हैं !
हमें देख कर और घबरा रहे हैं

इलाही! मेरे यह  अदा कौन उनकी
कि छुपते हुए भी नज़र आ रहे हैं

उन्हें आईना क्या ज़रा सा दिखाया
वो पत्थर उठाए इधर आ रहे हैं

सुनाया जो उनको ग़मों का फ़साना
वह झुझँला रहे है, वो शरमा रहे हैं

मुहब्बत का हासिल है आह-ओ-फ़ुगाँ बस
ये कह कह के हम को वो समझा रहे हैं

बना कर बहाने वो झूठी कहानी
सुना कर हमे कब से बहला रहे हैं ।

कहानी पुरानी है उल्फ़त की "आनन्"
हमी तो नहीं है  जो दुहरा रहे हैं

-आनन्द पाठक-






रविवार, 7 फ़रवरी 2010

गीत 024 : जिसने मुझे बनाया...[भाग 02]

गीत 024: जिसने मुझे बनाया [ भाग-02]

जिसने मुझे बनाया ,उसका ही गीत गाया
दरबारियों के आगे कभी सर नहीं झुकाया

मिट्टी सा भुरभुरा तन किसके लिए सजाया
यह कब रहा था अपना जो अब हुआ पराया
पानी के बुलबुले पर तस्वीर ज़िन्दगी की
किसने अभी उकेरा किसने अभी मिटाया

इस दिल के आइने पर जो गर्द सी जमी है
जब भी हटा के देखा तेरा ही रूप पाया

जब तक रही थीं साँसे सब लोग थे दिवाने
दो साँस कम हुई क्या अपने हुए बेगाने
जीने की हड़बड़ी में ,कुछ जोड़-तोड़ पाया
रह जाएंगे यहीं सब मेरे भरे ख़ज़ाने

जब आप ने बुलाया ,बिन पाँव दौड़ आए
अफ़सोस बस यही है कुछ साथ ला न पाया

छोटी सी ज़िन्दगी थी सपने बड़े-बड़े थे
कुछ पाप-पुण्य क्रम थे हम बीच में खड़े थे
कभी सत्य के मुकाबिल रही झूठ की गवाही
अन्दर से क्षत-विक्षत थे जो उम्र भर लड़े थे

इस रास्ते से जाते देखा किए सभी को
इस रास्ते से वापस आते न देख पाया

-आनन्द पाठक ’आनन’
880092 7181