शनिवार, 15 मार्च 2014

गीत 53 : छेड़ गईं फागुनी हवाएँ........

आ0 मित्रो !

आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें........

होली गीत 

छेड़ गईं फागुनी हवाएँ
रंग चलो प्यार का लगाएँ

आई है कान्हा की टोली
राधा संग खेलन को होरी
" मोड़ ना कलाई  कन्हैया
काहे को करता बरजोरी "
ध्यान रहे होली में इतना मर्यादाएँ न टूट जाएँ
रंग चलो प्यार का लगाएँ...............

देख रही दुनिया है सारी
कुछ तो शर्म कर अरे मुरारी
लाख पड़े चाहे तू पईंयाँ
मैं न बनूँ रे कभी तुम्हारी
लोग कभी नाम मेरा लेंगे ,नाम तेरा साथ में लगाएँ
रंग चलो प्यार का लगाएँ............

मन की जो गाँठे ना खोली
काहे की, कैसी फिर होली
दिल से जो दिल ना मिल पाया
फीकी है स्वागत की बोली
रूठ गया अपना जो कोई ,आज चलो मिल के सब मनायें
रंग चलो प्यार का लगाएँ.........

आया है होली का  मौसम
तुम भी जो आ जाते,प्रियतम !
भर लेती खुशियों से आँचल
सपनों को मिल जात हमदम
रंग प्रीत का प्रिये लगा दो, उम्र भर जिसे छुड़ा न पाएँ
रंग चलो प्यार का लगाएँ.........................

-आनन्द.पाठक-’आनन’-
8800927181





शनिवार, 25 जनवरी 2014

ग़ज़ल 57 [52] : राह अपनी वो चलता गया....


ग़ज़ल 57[52]

मंच के सभी सदस्यों को 
 गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें और नई उम्मीदों से नए दिवस का स्वागत
छोटी बहर में -एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूं
’मतला’ से इशारा साफ़ हो जायेगा ,बाक़ी आप सब स्वयं समझ जायेंगे

फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन
212---212---212


राह अपनी वो चलता रहा
’आप’ से ’हाथ’ जुड़ता रहा

मुठ्ठियाँ इन्क़लाबी रहीं
पाँव लेकिन फिसलता रहा

एक सैलाब आया तो था
धीरे धीरे उतरता रहा

जादूगर तो नहीं ,वो मगर
जाल सपनों का बुनता रहा

एक चेहरा नया सा लगा
रंग वो भी बदलता रहा

एक सूरज निकलने को था
उस से पहले ही ढलता रहा

जिस से ’आनन’ को उम्मीद थी
वो भरोसे को छलता रहा ।

-आनन्द.पाठक

[सं 300918]


शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

गीत 52: छा न जाएँ शहर पे

गीत 052

छा न जाएं शहर पे ये ख़ामोशियाँ
तुम भी गाती रहो,मैं भी गाता रहूँ

ये शहर था  हमारे  लिए  अजनबी
एक तुम जो मिली तो ख़ुशी ही ख़ुशी
अब ख़ुदा से हमें और क्या  माँगना
तुम मेरी ’मेनका’ तुम मेरी  ’उर्वशी’
लिख सको तो मिलन गीत ऐसा लिखो
उम्र भर मैं जिसे गुनगुनाता  रहूँ

लोग आते यहाँ अपने सपने लिए
एक मक़सद लिए ज़िन्दगी के लिए
सबको जल्दी पड़ी ,सबको अपनी पड़ी
कोई रुकता नहीं दूसरों के लिए
थक न जाओ कहीं चलते चलते यहाँ
अपनी पलकों पे तुम को बिठाता रहूँ

भीड़ का एक समन्दर हुआ है शहर
किसकी मंज़िल किधर और जाता किधर
जिसको साहिल मिला वो सफल हो गया
किसकी डूबी है कश्ती किसे है ख़बर
इस शहर में कहीं राह भटको न तुम
प्रेरणा का दिया मैं जलाता  रहूँ

हर गली मोड़ पे होती दुश्वारियाँ
जब निगाहें ग़लत चीरती है बदन
ज़िन्दगी के सफ़र में हो तनहाईयां
ढूँढती है वहीं दो बदन-एक मन
सर टिका दो अगर मेरे कांधे से तुम
आशियाँ एक अपना बनाता रहूँ

-आनन्द.पाठक ’आनन’-
8800927181