सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल 127 [99D]: सब को अपनी अपनी पड़ी है---

21----121---121---122
बह्र-ए-मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़  मक़्बूज़ सालिम
-----------

एक ग़ज़ल 127[99D]

सब को अपनी अपनी पड़ी है
हर आँगन  दीवार  खड़ी  है

अच्छे दिन कैसे आएँगे  ?
सत्ता ही जब ख़ुद लँगड़ी  है

राहनुमाई  क्या करता वह
नाक़ाबिल है ,सोच सड़ी  है

कैसे उतरे चाँद  गगन  से ?
राहू-छाया द्वार  खड़ी   है

बिन व्याही बेटी के बापू
गिरवी में  रख्खी  पगड़ी  है

झूठे  वादों से न बुझेगी
आग उदर की, भूख बड़ी है

सच पर पहरेदारी ’आनन’
पाँवों  में जंजीर पड़ी  है

To visit my channel CLICK the Link below
www.youtube.com/@33akp

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

ग़ज़ल 126 : मैं अपना ग़म सुनाता हूँ

1222---1222---1222---1222
मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
-------------------------------
एक ग़ज़ल

मैं अपना ग़म सुनाता हूँ ,वो सुन कर मुस्कराते हैं
वो मेरी दास्तान-ए-ग़म को ही नाक़िस बताते हैं

बड़े मासूम नादाँ हैं  ,खुदा कुछ अक़्ल दे उनको
किसी ने कह दिया "लव यू" ,उसी पर जाँ लुटाते हैं

सलीक़े से, मुहब्बत से,अदाओं से, नज़ाक़त से
वो मेरी ही ग़ज़ल अपनी बता, मुझको सुनाते हैं

तुम्हारे सामने हूँ मैं , हटा लो यह निक़ाब-ए-रुख
कि ऐसे प्यार के मौसम कहाँ हर रोज़ आते हैं

गिला करते भला किस से ,तुम्हारी बेनियाज़ी का
यहाँ पर कौन सुनता है ,सभी अपनी सुनाते हैं

तसव्वुर में हमेशा ही तेरी तस्वीर रहती है
हज़ारों रंग भरते हैं, बनाते हैं , सजाते हैं

दिल-ए-सदचाक पर जानम, सितम कुछ और कर लेते
समझ जाते वफ़ा क्या चीज है , कैसे निभाते हैं

मुहब्बत का दिया रख दर पे उनके आ गया ’आनन’
कि अब यह देखना है वो बचाते  या बुझाते हैं

-आनन्द.पाठक--
p
शब्दार्थ
नाक़िस = बेकार ,व्यर्थ
दिल-ए-सद चाक = विदीर्ण हृदय
To visit my channel CLICK the Link below
www.youtube.com/@33akp

इसी ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुनें--

बुधवार, 11 सितंबर 2019

ग़ज़ल 125 [42 D] : आप से आज क्या क्या माँगू---

ग़ज़ल 125[42 D]

2122-----1222
फ़ाअ’लातुन---मुफ़ाईलुन
बह्र-ए-मुशाकिल मुरब्ब: सालिम
-----------------------

ग़ज़ल :  आप से आज क्या माँगू

आप से आज  क्या  माँगू
दर्द-ए-दिल की दवा माँगू

हुस्न उनका क़यामत है
दाइमी की  दुआ  माँगू

क़ैद हूँ जुर्म-ए-उल्फ़त में
उम्र भर की सज़ा  माँगू

ज़िन्दगी भर नहीं  उतरे
इश्क़ का वह नशा माँगू

सादगी  से  मुझे  लूटा
वो ही तर्ज-ए-अदा माँगू

आप की बस इनायत हो
आप से और क्या माँगू

हमसफ़र आप सा ’आनन’
साथ मैं  आप का माँगू

-आनन्द.पाठक-
To visit my channel CLICK the Link below
www.youtube.com/@33akp