शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ : क़िस्त 042

 अनुभूतियाँ 042 ओके
165
कैसे पूछूँ हाल तुम्हारा ?
कह दोगी “तुम से क्या मतलब?’
ख़ार अभी तक खाए बैठी
कौन उन्हें समझाए, यारब !
166
मौसम आएँगे, जाएँगे
अब की बार न तुम आओगी,
याद तुम्हारी पास रहेगी
दूर कहाँ तक तुम जाओगी ।
 
167
सितमगरी ऐसी भी क्या जो
पल भर को ना दम भरने दे
उस पर तेरा हुस्न क़यामत
ना जीने दे, ना मरने दे
 
168
मलय-गन्ध से भींगी भींगी
आएगी जब याद तुम्हारी,
उतने से ही हो जायेगी
हस्ती यह गुलजार हमारी ।
 

अनुभूतियाँ :क़िस्त 041

 अनुभूतियाँ 041 ओके
161
देकर साथ समय पर तुम ने
ख़ुशियाँ भर दी है झोली में
रूप तुम्हारा सजा रखा है
अपने मन की रंगोली में
 
162
लोगों ने जो झूठ कहा है
तुमने क्यों सच मान लिया है ?
बात नहीं मेरी सुननी है-
क्या तुमने यह ठान लिया है ?
 
163
अपने मन की बात कहाँ है
होगा वही जो रब की मरजी,
तुम से यह उम्मीद नहीं थी
प्यार मुहब्बत में ख़ुदगरजी ।
 
164
रूप तुम्हारा ही काफी था
और क़यामत क्या ढाती तुम,
सुध-बुध अपनी खो देता हूँ
मधुरिम स्वर में जब गाती तुम ।
 

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

अनुभूतियाँ : क़िस्त 040

 अनुभूतियाँ 040 ओके


157
कितने तारे नभ में बिखरे
नहीं रोशनी हुई धरा पर,
हर तारे को भरम यही है
वहीं चाँद है, वही दिवाकर
 
158
लाखों तारे नील गगन में
एक सितारा तन्हा भी है ।
खुशियाँ बाँटी सबसे मिल कर
दर्द अकेले सहना भी है ।
 
159
बात तुम्हारी यूँ तो सही है
मौसम, सुख-दुख, आना, जाना
जीवन के इस रंग-मंच पर
जो भी है किरदार, निभाना
 
160
जख़्म भला है कौन सा ऐसा
वक़्त नही जिसको भर पाए
जख़्म दिया जो तुमने मुझको
    भरते भरते वह भर जाए ।  


-आनन्द.पाठक-          
इन अनुभूतियों कॊ आ0 विनोद कुमार उपाध्याय जी के स्वर में सुनें--
https://www.facebook.com/vinodkumar.upadhyay.9/videos/1260064599077045