शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

अनुभूतियाँ : क़िस्त 044

 अनुभूतियाँ 044 ओके
173
तोड़ दिया जब तुमने बन्धन
क्या कहता है कोई, छोड़ो,
छोड़ो भूली बिसरी बातें-
नया किसी से नाता जोड़ो ।
 
174
पढ़ लो मेरी आँखों में तुम
वही पुरानी एक शिकायत
बस मुझ पर ही सितमगरी है
ग़ैरों पर तो खूब इनायत।
 
175
यह भी कोई बात हुई क्या
मैं कुछ पूछूँ तुम ना बोलो
पहलू में   तो आक बैठॊ
हृदय पटल भी ना तुम खोलो
 
176
पेड़ हरा था, सूख गया अब
पात पात झड़ गए डाल के,
तुमने सोचा, अच्छा सोचा
क्या करना मुझको सँभाल के ।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 043

 अनुभूतियाँ 043 ओके
169
सूरज डूबा, शाम ढली अब
धीरे धीरे “मै” भी छूटा ,
बाँध सका मुठ्ठी में कितना
एक भरम था मेरा टूटा ।
 
170
सोच रहा हूँ जाने कब से
सच में तुम थी या माया थी,
रूप तुम्हारा आभासी था
या छाया की प्रतिछाया थी ।
 
171
वह एक ’कल्पना’  कि ’प्रेरणा’
कौन बसी है? ज्ञात नहीं है,
जीवन भर की "अनुभूति" है
पल-दो पल की बात नहीं है ।
 
172
देख चुका हूँ दुनिया तेरी
घात कुटिल और मीठी बानी,
रूप भले ही अलग अलग हों
चाल मगर जानी पहचानी ।
 

अनुभूतियाँ : क़िस्त 042

 अनुभूतियाँ 042 ओके
165
कैसे पूछूँ हाल तुम्हारा ?
कह दोगी “तुम से क्या मतलब?’
ख़ार अभी तक खाए बैठी
कौन उन्हें समझाए, यारब !
166
मौसम आएँगे, जाएँगे
अब की बार न तुम आओगी,
याद तुम्हारी पास रहेगी
दूर कहाँ तक तुम जाओगी ।
 
167
सितमगरी ऐसी भी क्या जो
पल भर को ना दम भरने दे
उस पर तेरा हुस्न क़यामत
ना जीने दे, ना मरने दे
 
168
मलय-गन्ध से भींगी भींगी
आएगी जब याद तुम्हारी,
उतने से ही हो जायेगी
हस्ती यह गुलजार हमारी ।