गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023

ग़ज़ल 342 [18F] : यार के कूचे में जाना कब मना है !

 ग़ज़ल 342[18F]

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यार के कूचे में जाना कब मना है !
दर पे उसके सर झुकाना कब मना है !

मंज़िलें तो ख़ुद नहीं आएँगी  चल कर
रास्ता अपना बनाना कब मना है !

प्यास चातक की भला कब बुझ सकी है
तिशनगी लब पर सजाना कब मना है !

रोकती हैं जो हवा को,रोशनी को-
उन दीवारों को गिराना कम मना है !

ज़िंदगी बोझिल, सफ़र भारी लगे तो
प्यार के नग्में सुनाना कब मना है !

ज़िंदगी है तो सदा ग़म साथ होंगे
पर ख़ुशी के गीत गाना कब मना है !

जो अभी हैं इश्क़ में नौ-मश्क ’आनन’
हौसला उनका बढ़ाना कब मना है !


-आनन्द.पाठक-

सं 28-06-24

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

ग़ज़ल 341[17F] : तेरी गलियों में जब से हैं जाने लगे

 ग़ज़ल 341[17F]

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तेरी गलियों में जब से हैं जाने लगे
जिस्म से रूह तक मुस्कराने लगे

दूर से जब नज़र आ गया बुतकदा
घर तुम्हारा समझ  सर झुकाने लगे

इश्क़ दर्या है जिसका किनारा नही
यह समझने में मुझको ज़माने लगे

देखने वाला ही जब न बाकी रहा
किसकी आमद में खुद को सजाने लगे

ये ज़रूरी नहीं सब ज़ुबां ही कहे
दर्द आँखों से कुछ कुछ बताने लगे

तुमने मुझको न समझा न जाना कभी
ग़ैर की बात में  क्यों तुम आने लगे

राह-ए-हक़ से तुम ”आनन’ न गुज़रे कभी
इसलिए सब हक़ीक़त फ़साने लगे ।


-आनन्द.पाठक-

सं 28-06-24

गुरुवार, 14 सितंबर 2023

ग़ज़ल 340 [16F]: क्यों अँधेरों में जीते हो मरते हो तुम

 ग़ज़ल  340[16F]

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क्यों अँधेरों में जीते हो मरते हो तुम
रोशनी की नहीं बात करते हो तुम ।

रंग चेहरे का उड़ता क़दम हर क़दम
सच की गलियों से जब भी गुज़रते हो तुम

कौन तुम पर भरोसा करे ? क्यों करे?
जब कि हर बात से ही मुकरते हो तुम

राह सच की अलग, झूठ की है अलग
राह ए हक  पर भला कब ठहरते हो तुम ?

वो बड़े लोग हैं, उनकी दुनिया अलग
बेसबब क्यों नकल उनकी करते हो तुम ?

वक़्त आने पे लेना कड़ा फ़ैसला
उनके तेवर से काहे को डरते हो तुम ?

तुमको उड़ना था ’आनन; नहीं उड़ सके
तो परिंदो के पर क्यों कतरते हो तुम ?


-- आनन्द,पाठक--

सं 28-06-24