मंगलवार, 14 मई 2024

ग़ज़ल 367[40F] : इज़हार-ए-मुहब्बत के आदाब हुआ करते


ग़ज़ल 367 [40F]

221---1222-// 221--1222


इज़हार-ए-मुहब्बत के आदाब हुआ करते,
अपनी तो सुनाते हो, मेरी भी सुना करते।

कहने को कहो जो भी, होना था यही आख़िर,
हमने तो वफ़ा की थी, तुम भी तो वफ़ा करते ।

आसान नहीं होता, जीवन का सफ़र ,हमदम!
कुछ सख़्त मराहिल भी, हस्ती में हुआ करते ।

सरमस्त जो होते हैं रोके से कहाँ रुकते
उनकी तो अलग दुनिया, मस्ती में जिया करते।

कब सूद, जियाँकारी होती  है मुहब्बत में ,
उल्फ़त का तक़ाज़ा है, दिल खोल मिला करते।

होती है मुहब्बत की, तासीर कभी तारी 
अग़्यार भी जाने क्यों, अपने ही लगा करते।

आग़ाज़-ए-मुहब्बत से ’आनन’ तू परीशां क्यों
होतें है फ़ना सब ही, जो इश्क़ किया करते ।


-आनन्द.पाठक-


मराहिल = पड़ाव

 जियाँकारी = कदाचार ,बुरे आचरण/विचार

अग़्यार = ग़ैर लोग, अनजान लोग

सरमस्त = बेसुध, मतवाला

तासीर = असर, प्रभाव

सं 30-06-24

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रविवार, 12 मई 2024

ग़ज़ल 366 [47A] : मुशकिल है बहुत मुशकिल

ग़ज़ल 366 [ 47-अ] ओके

221---1222// 221-1222


मुश्किल है बहुत मुश्किल अपनों से विदा लेना
नायाब हैं ये आँसू, पलकों में छुपा लेना  ।
 
किस दिल में तुम्हे रहना, अधिकार तुम्हारा है, 
राहों में अगर मिलना, नज़रें न झुका लेना ।
 
जो साथ तुम्हारे हैं, मुँह मोड़ के चल देंगे ,
जो रूठ गए अपने, उनको तो मना लेना ।
 
हैं लोग बहुत ऐसे, सब कुछ न जिन्हें मिलता
हासिल जो हुआ कुछ भी, बस दिल से लगा लेना।
 
जीवन का सफ़र लम्बा, आसान नहीं होता ,
अपना जो लगे तुमको, हमराह बना लेना ।
 
महफ़िल में तुम्हारे जब, कल मैं न रहूँ शामिल
पर गीत मेरे होंगे, अधरों पे सजा लेना ।
 
’आनन’ है अभी पागल, आदत न गई उसकी
राहों में पड़े काँटे, पलकों से उठा लेना ।


-आनन्द. पाठक- 

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शनिवार, 11 मई 2024

ग़ज़ल 365 [39F]: अच्छा हुआ कि आप जो

 ग़ज़ल 365[39F]

221---2121---1221---212


अच्छा हुआ कि आप जो आए नहीं इधर
पत्थर लिए खड़े अभी कुछ लोग बाम पर

श्रद्धा के नाम पर  खड़ी अंधों की भीड़ है
जाने किधर को ले के चलेगा यह राहबर ।

मिलता है दौड़ कर जो गले से, तपाक से
मिलिए उस आदमी से तो दामन सँभाल कर।

वैसे तुम्हारे शहर का हमको नहीं पता ,
लेकिन हमारे शहर का माहौल पुरख़तर !

आँखों में ख़ास रंग का चश्मा चढ़ा हुआ ,
देखा न उसने सच कभी , चश्मा उतार कर।

हालात शादमान कि ना शादमान हो,
जीना यहीं है छोड़ के जाना है अब किधर ।

ऐसी तुम्हारी जात तो ’आनन’ कभी न थी
कुछ माल-ओ-ज़र बना लिए दस्तार बेच कर ।


-आनन्द पाठक-


शादमान, नाशादमान = सुख-दुख , हर्ष विषाद

जात = व्यक्तित्व

माल-ओ- ज़र = धन दौलत

दस्तार = पगड़ी ,इज्जत

सं 30-06-24


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