शुक्रवार, 10 जून 2016

एक ग़ज़ल 81[28] : सपनों में लोकपाल था----

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल
 मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु----मफ़ाईलु----फ़ाअ’लुन/फ़ाइलान
221---------2121------1221-----212      /2121


 सपनों में ’लोकपाल’ था  मुठ्ठी में इन्क़लाब
 ’दिल्ली’ में जा के ’आप’ को क्या हो गया जनाब !

 वादे किए थे आप ने ,जुमलों का क्या हुआ
 अपने का छोड़ और का लेने लगे हिसाब  ?

 कुछ आँकड़ों में ’आप’ को जन्नत दिखाई दी
 गुफ़्तार ’आप’ की हुआ करती  है लाजवाब

 लौटे हैं हाथ में लिए बुझते हुए  चराग
 निकले थे घर से लोग जो लाने को माहताब

 चढ़ती नहीं है काठ की हाँडी ये बार बार
 कीचड़ उछालने से ही  होंगे न कामयाब

 जो बात इब्तिदा में थी अब वो नहीं रही
 अब वो नहीं है धार  ,न तेवर ,न आब-ओ-ताब

 गुमराह हो गया है  मेरा मीर-ए-कारवां
 ’आनन’ दिखा रहा है वो फिर भी हसीन ख़्वाब

 -आनन्द.पाठक-
[सं 30-06-19]

शब्दार्थ
आप [A.A.P]   =Noun or pronoun जो आप समझ लें
गुफ़्तार   = बातचीत
मीर-ए-कारवाँ  = कारवां का नेतृत्व करने वाला 

शनिवार, 28 मई 2016

एक ग़ज़ल 80[26] : अगर सोच में तेरी पाकीजगी है....

मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--ऊलुन--फ़ऊलुन—

122------122------122-----122

अगर सोच में तेरी पाकीज़गी है
इबादत -सी तेरी  मुहब्बत लगी है

मेरी बुतपरस्ती का जो नाम दे दो
मैं क़ाफ़िर नहीं ,वो मेरी बन्दगी है

कई बार गुज़रा हूँ तेरी गली से 
कि हर बार बढ़ती गई तिश्नगी है

अभी नीमगुफ़्ता है रूदाद मेरी
अभी से मुझे नींद आने लगी है

उतर आओ दिल में तो रोशन हो दुनिया
तुम्हारी बिना पर ही ये ज़िन्दगी है

ये कुनबा,ये फ़िर्क़ा हमीं ने बनाया
कहीं रोशनी तो कहीं तीरगी  है

मैं राह-ए-तलब का मुसाफ़िर हूँ ’आनन’
मेरी इन्तिहा मेरी दीवानगी  है

-आनन्द पाठक-

[सं 30-06-19]

शब्दार्थ
पाकीज़गी  = पवित्रता
बुत परस्ती        = मूर्ति पूजा ,सौन्दर्य की उपासना
तिशनगी = प्यास
नीम गुफ़्ता रूदाद-=आधी अधूरी कहानी/किस्से ,अधूरे काम
तुम्हारी बिना पर = तुम्हारी ही बुनियाद पर
तीरगी =अँधेरा
राह-ए-तलब का मुसाफ़िर= प्रेम मार्ग का पथिक

शनिवार, 21 मई 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 032


माहिए : क़िस्त 032 ओके

:1:
जब तुम ने नहीं माना
टूटे रिश्तों को
फिर क्या ढोते जाना

:2:
इस दिल ने पुकारा है
ख़ामोशी तेरी, 
मुझ को न गवारा है

:3:
तुम तोड़ गए सपने
ऐसा भी होगा
सोचा था नहीं हमने

  :4:
जब तुमको छकाना है
आँख मिचौली में
तुम से छुप जाना था

5
हर रंग जो सच्चा है
प्रीत मिला दे तो
सब रंग से अच्छा है


-आनन्द पाठक ’आनन’-
 880092 7181