बुधवार, 28 जुलाई 2021

अनुभूतियाँ : क़िस्त 009


अनुभूतियाँ 009




33

प्रश्न तुम्हारा वहॊं खड़ा है

मैं ही उत्तर ढूँढ न पाया ।

ग्यान-ध्यान क्या, दर्शन क्या है

मूढ़्मना को समझ न आया ।


34

प्रथम मिलन की यादें बाक़ी

आई थी तुम नज़र झुका कर

जाने किसकी  नज़र लग गई

भाग गई तुम आँख बचा कर

 

35

वैसे थी तो बात ज़रा सी  

तुम ने तिल का ताड़ बनाया

दोष किसी का, ग़लती किसकी

मेरे सर इलजाम लगाया

 

36

जाना ही था, कह कर जाती

 दिल के टुकड़े चुन कर जाती

मेरी भी क्या थी मजबूरी 

 कुछ तो मेरी  सुन कर जाती




-आनन्द.पाठक-’आनन’-




ग़ज़ल 189 : जो रंग अस्ल है ---

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ग़ज़ल 189

जो रंग अस्ल  है  वो दिखाएगा एक दिन
वो सरफ़िरा है होश में आएगा  एक दिन

नफ़रत के शह्र में भरा बारूद का धुआँ
पैग़ाम-ए-इश्क़ कोई सुनायेगा एक दिन

कुछ लोग हैं कि अम्न के दुश्मन बने हुए
यह वक़्त उनको खुद ही मिटाएगा एक दिन

किस बात पर गुरूर है ,किस बात का नशा
सब कुछ यहीं तू छोड़ के जाएगा एक दिन

हम तो इसी उमीद में करते रहे वफ़ा
वह भी वफ़ा का फ़र्ज़ निभाएगा एक दिन

वैसे हज़ार बार वो इनकार कर चुका
आने को कह गया है तो आएगा एक दिन

’आनन’ उमीद रख अभी आदम के हुनर पर
सूरज उतार कर यही लाएगा एक दिन

-आनन्द,पाठक-

रविवार, 25 जुलाई 2021

ग़ज़ल 188 :अगर मिलते न तुम मुझको

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ग़ज़ल 188

अगर मिलते न तुम मुझको, ख़ुदा जाने कि क्या होता
सफ़र तनहा मेरा होता कि दिल फिर रो दिया होता

हमें खुद ही नहीं मालूम किस जानिब गए होते
इधर जो मैकदा होता ,उधर जो बुतकदा  होता

चलो अच्छा हुआ, ज़ाहिद! अलग है रास्ता अपना
जो मयख़ाने के दर पर सामना होता तो क्या होता

निक़ाब-ए-रुख़ उठा लेते वो, मेरा दिल सँवर जाता
हक़ीक़त सामने होती ,मज़ा कुछ दूसरा होता

ये दुनिया भी किसी जन्नत से कमतर तो नहीं दिखती
हसद से या अना से तू जो बाहर आ गया होता

भले कुछ दो न झोली में ,ये दिल अपना फ़क़ीराना
फ़क़ीरों के लबों पर तो सदा हर्फ़-ए-दुआ होता

मुहब्बत भर गई होती सभी के दिल में जो”आनन’
तो फिर यह देखती दुनिया ज़माना क्या से क्या होता !

-आनन्द.पाठक-

हसद = ईर्ष्या ,जलन,डाह
अना = अहम , अहंकार ,घमंड

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