बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 306[71इ] : मंज़िल पे है नज़र मुझे काँटों का डर नहीं

 ग़ज़ल 306 [71 इ]

221---2121--1221---212


मंज़िल पे  है नज़र, मुझे काँटों का डर नहीं
छाले पड़े हैं पाँव में कहता मगर नही

पत्थर के देवता से ही अब कुछ उमीद है
गो, आँसुओं का उस पे भी होता असर नहीं

यह तो मकान और किसी का मकीन तू
दो दिन का है क़याम यहाँ, तेरा घर नहीं

ठोकर लगा के आप ने दिल तोड़ क्यों दिया
 क्या दिल गरीब का अभी है मोतबर नहीं ?
 
गो, हादिसे तमाम तेरे सामने हुए
उस पर दलील यह कि तुझे कुछ ख़बर नहीं 

दो-चार लाइनों में सुनाऊँ तो किस तरह
ये दास्तान ज़िंदगी की मुख़्तसर नहीं

जब इन्तखाब तुमको निगाहों ने कर लिया”
आनन’ को दूसरा कोई आता नज़र नहीं


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 11 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 305[70इ] : निज़ाम आया नया है

 ग़ज़ल 305 [ 70इ]


1222---122


निज़ाम आया नया है
बयाँ सच का मना है

उधर आँसू गिरे हैं
इधर पत्थर गला है

अगर तुम चुप रहोगे
तो फिर मालिक ख़ुदा है

अमीर-ए-कारवाँ बन
हमे फिर छल रहा है

मेरी ख़ामोशियों का
किसी को क्या पता है

दिया नन्हा सही, पर
अँधेरों से लड़ा  है

सवालों के मुक़ाबिल
इधर ’आनन’ खड़ा है 


-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

ग़ज़ल 304 [69इ] : सफ़र हयात का आसाँ मेरा हुआ होता

 ग़ज़ल 304 [69इ]

1212---1122---1212---22


सफ़र हयात का आसाँ मेरा हुआ होता 
हबीब आप सा कोई अगर मिला होता

निगाह आप ने मुझसे न फ़ेर लॊ होती
हक़ीर आप के कुछ काम आ गया होता

इधर उधर न भटकते तेरी तलाश में हम
तवाफ़ दिल का कभी हम ने कर लिया होता

अना की क़ैद से बाहर कभी नहीं निकला
अगर वो शख़्स निकलता तो कुछ भला होता

सज़ा गुनाह की मेरे न कुछ मिली होती
बयान आप ने ख़ारिज़ न कर दिया होता

जो दिल में आप की तसवीर हम नहीं रखते
ख़ुमार प्यार का अबतक उतर गया होता

हर एक दर पे झुकाता नहीं है सर ’आनन’
दयार आप का होता तो सर झुका होता ।


-आनन्द.पाठक-


तवाफ़ = परिक्र्मा करना