221-------2121-------1221---212
मफ़ऊलु—फ़ाअ’लातु-मफ़ाईलु—फ़ाइलुन
बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
---------------- ----------
एक ग़ज़ल
वह
शख़्स देखने में तो लगता ज़हीन है,
अन्दर
से हो ज़हीन, न होता यक़ीन है ।
कहने
को तो हसीन वह ,चेहरा
रँगा-पुता,
दिल
से भी हो हसीन तो, सच में हसीन है।
सच
बोल कर मैं सच की दुहाई भी दे रहा
बातिल को अपने झूठ पे कितना यक़ीन है ।
वह
ज़हर घोलता है फ़िज़ाओं में रात-दिन,
उसका
वही ईमान है, उसका वो दीन है ।
ज़ाहिद
ये तेरा फ़ल्सफ़ा अपनी जगह सही,
गर
हूर है उधर तो इधर महजबीन है ।
क्यों ख़ुल्द से निकाल दिए इस ग़रीब को,
यह
भी जमीं तो आप की अपनी जमीन है।
’आनन’
तू बदगुमान में, ये तेरा घर नहीं,
यह
तो मकान और का, बस तू मकीन है।
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
ज़हीन = सभ्य ,भला
आदमी
मुतमईन
है = निश्चिन्त है ,बेफ़िक्र है
फ़लसफ़ा
= दर्शन ,ज्ञान
महजबीन = चाँद सा
चेहरे वाली
खुल्द से= जन्नत से [ आदम का खुल्द से
निकाले जाने की जानिब इशारा है ]
मकीन = निवासी
[प्र0]