सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल 130 : क़ानून की नज़र में --

221----2122---// 221--2122


ग़ज़ल

’क़ानून की नज़र में ,सब एक हैं , बराबर
रखते रसूख़वाले  , पाँवो  तले दबा कर ।

कल तक जहाँ खड़ा था ,"बुधना" वहीं खड़ा है
लूटा है रहबरों  ने,सपने  दिखा दिखा  कर

जब आम आदमी की आँखों में हों शरारे
कर दे नया सवेरा ,सूरज नया  उगा कर

क्या सोच कर गए थे ,तुम आइना दिखाने
अंधों की बस्तियों  से , आए फ़रेब खा कर

जब दल बदल ही करना, तब दीन क्या धरम क्या
हासिल हुई हो कुरसी ,ईमान जब लुटा कर

उनका लहू बदन का ,अब हो गया है पानी
रखते ज़मीर अपना ,’संसद’ में वो सुला कर

यह देश है हमारा ,हमको इसे बचाना

 सींचा सभी ने इसको ,अपना लहू बहा कर

’आनन’ ज़मीर तेरा ,अब तक नहीं मरा है
रखना इसे तू ज़िन्दा ,गर्दिश में भी  बचा कर

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल 129 :दुश्मनी कब तक निभाओगे---

2122---2122---2122
फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन
बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम
--------------------------

एक ग़ज़ल : दुश्मनी कब तक-----

दुश्मनी कब तक निभाओगे कहाँ तक  ?
आग में खुद को जलाओगे  कहाँ  तक  ?

है किसे फ़ुरसत  तुम्हारा ग़म सुने जो
रंज-ओ-ग़म अपना सुनाओगे कहाँ तक ?

नफ़रतों की आग से तुम खेलते हो
पैरहन अपना बचाओगे  कहाँ  तक ?

रोशनी से रोशनी का सिलसिला है
इन चरागों को बुझाओगे कहाँ  तक ?

ताब-ए-उलफ़त से पिघल जाते हैं पत्थर
अहल-ए-दुनिया को बताओगे कहाँ  तक ?

सब गए हैं ,छोड़ कर जाओगे तुम भी
घर ये अपना ले के जाओगे कहाँ  तक ?

जाग कर भी सो रहे हैं लोग , कस्दन
तुम उन्हें ’आनन’ जगाओगे कहाँ  तक ?

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
पैरहन = लिबास ,वस्त्र
ताब-ए-उलफ़त से = प्रेम की तपिश से
अहल-ए-दुनिया को = दुनिया के लोगों को
राह-ए-हक़ हूँ    = सत्य के मार्ग पर हूँ
क़सदन            = जानबूझ कर
To visit my channel CLICK the Link below

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल 128 : इश्क़ करना


212---212---22
फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़अ’लुन
बह्र-ए-मुत्दारिक मुसद्दस सालिम मक़्तूअ’
-----

इश्क़ करना ख़ता क्यों है ?
इश्क़ है तो छिपा  क्यों है ?

जाविदाँ हुस्न है  उनका
इश्क़ फिर नारवा क्यों है?

दिल अगर है खुला उनका
लौट आती सदा क्यों है ?

ज़िन्दगी बस बता मुझको
बेसबब तू ख़फ़ा क्यों है ?

आब-ओ-गिल से बने हम तुम
रंग अपना जुदा क्यों है ?

इश्क़ भी क्या अजब शय है
रोज़ लगता नया क्यों  है ?

रस्म-ए-उल्फ़त निभाता हूँ
फिर भी ’आनन’ बुरा क्यों है ?

-आनन्द.पाठक-
To visit my channel CLICK the Link below
www.youtube.com/@33akp

शब्दार्थ
बाब-ए-दिल = हृदय पटल
जाविदाँ हुस्न = अनश्वर सौन्दर्य
नारवा       = जो रवा न हो ,अनुचित
आब-ओ-गिल से = पानी-मिट्टी से