गुरुवार, 9 मई 2024

ग़ज़ल 364[30 A ]: ठोकर लगी किसी को--

 ग़ज़ल  364 [30 A]  ओके

221--2122   // 221---2122


ठोकर लगी किसी को, आँखें खुली किसी की 
गिर कर सँभल भी जाना, यह सीख ज़िंदगी की ।

रफ़्तार-ए-ज़िंदगी  से वह तेज दौड़ता है ,
चाहत हज़ार चाहत क्यों एक आदमी की ?

मरता था माल-ओ-ज़र पर, जो भी गया यहाँ से
इक दास्तान-ए-आख़िर, मुठ्ठी  खुली हुई की ।

परबत से, घाटियों से, चल कर यहाँ तक आई
सागर को क्या पता है, क्या प्यास इक नदी की ?

मँडरा रहें है बादल, आसार जंग के हैं ,
हर देश खौफ़ में है ,पीड़ा नई सदी की ।

सूरज कहाँ रुका है , दो-चार जुगनुओं से 
सबकॊ पता है अपनी औक़ात रोशनी की ।

’आनन’ तमाम बातें , मालूम है तुम्हे भी , 
क्या बात मैने तुमसे, अब तक कोई नई की  ?


-आनन्द.पाठक-

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बुधवार, 8 मई 2024

दोहा 17: सामान्य दोहे

 दोहा 17: सामान्य दोहे

अगर प्यार से बोलता, मैं भी जाता मान ।
इतना भी क्या  है भरा, मन में अहम गुमान ।।

ग्यानी, ध्यानी लोग जो, हमे गए बतलाय ।
जिसकी जितनी उम्र है, उतना ही रुक पाय ॥

प्रेम प्रीत ना देखता, क्या है किसकी जात ।
होती रहती है जहाँ , दिल से दिल की बात ॥

खोटे सिक्के चल पड़े, जब उसके दो-चार ।
ख़ुद को कहने लग गया, हुनरमंद सौ बार ॥

सबकी मंज़िल एक है, भले अलग हों राह ।
जान रहे हैं यह सभी, फिर क्यों भरते आह ॥

अगर बंद है कर दिया, अपने मन का द्वार ।
फिर ना कोई आएगा, करने को उद्धार ॥

जंगल जंगल घूमता, खाक रहा क्यों छान ।
अपने अंदर जो बसा. उसको तो पहचान ॥

-आनन्द.पाठक ’आनन’
880092 7181

05/26

मंगलवार, 7 मई 2024

दोहा 16 : चुनावी दोहे

दोहा 16 : चुनावी दोहे

आँसू चार बटोर कर, भरी सभा ढुलकाय ।
इसी बहाने ही सही, चंद वोट मिल जाय ॥

मौसम नए चुनाव का, जुमलों की बौछार ।
जनता सुन सुन खुश हुई, जन्नत मेरे द्वार ॥

बाँट रहे हैं 'रेवड़ी', सबको गले लगाय ।
"वोट हमें देना सखे !"- नेता जी मिमियाय ॥

चाहे जिस दल में रहें, "कुर्सी" पर हो ध्यान ।
राजनीति के कर्म में , परम सत्य यह ज्ञान ।

हर दल करने लग गया, गठबंधन  बेमेल ।
नेता जी की चाल में, डाल-पात का खेल ।।

पंछी उड़ने लग गए, एहि डाल वो डाल ।
टिकट जहाँ से मिल सके, इस निर्वाचन काल ।।

वादा करने चल पड़े, खोजन लगे शिकार ।
"खटाखटा खट" से सखे!, बचना है इस बार ।।


-आनन्द पाठक ’आनन’
8800927181
05/26