शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

चन्द माहिए 107/17

 चन्द माहिए : 107 /17

:1:

प्रवचन तो अच्छा है
लेकिन मन भी क्या
उतना ही सच्चा है ?

:2:
क्यों  फेर रहा माला
साफ़ ज़रा कर लें
मन पर जो पड़ा जाला

:3:
मन साध नहीं ्पाया
चंदन टीका ही
केवल तुझको भाया

:4:
कंठी टीका माला
दंड कमंडल भी
मन फिर भी है काला

:5:
दुनिया को सिखाते हो
भगवाधारी बन
खुद कब अपनाते हो ?

-आनन्द पाठक-

सोमवार, 7 जुलाई 2025

ग़ज़ल 442 [16-G) : आदमी में शौक़-ए-उल्फ़त --

 ग़ज़ल  442[16-जी] : आदमी में शौक़-ए-उलफ़त 

2122---2122---2122---212


आदमी में शौक़-ए-उल्फ़त और रहमत चाहिए
सोच में हो सादगी, दिल में दियानत चाहिए ।


जब कि चेहरे पर तुम्हारे गर्द भी है दाग़ भी

सामने जब आईना , फिर क्या वज़ाहत चाहिए 

साँस ले ले कर ही जीना ज़िंदगी काफी नहीं 
ज़िंदगी के रंग में कुछ और रंगत  चाहिए ।

अह्ल-ए-दुनिया आप की बातें सुनेगे  एक दिन
आप की आवाज़ में कुछ और ताक़त चाहिए ।

कश्ती-ए-हस्ती हमारी और तूफ़ाँ सामने

ख़ौफ़ क्या, बस आप की नज़र-ए-इनायत चाहिए

जानता हूँ ज़िंदगी की राह मुशकिल, पुरख़तर

आप की बस मेहरबानी ता कयामत  चाहिए ।


ढूँढता हर एक दिल ’आनन’ सहारा , हमनशीं
मौज-ए-दर्या को भी साहिल की कराबत चाहिए ।


-आनन्द.पाठक-





बुधवार, 2 जुलाई 2025

ग़ज़ल 441-[15-जी ]: उनको अना ग़ुरूर का ऐसा चढ़ा--

 ग़ज़ल 441[15-G] : 

221---2121---1221---212


उनको अना, गुरूर का ऐसा चढ़ा नशा
ख़ुद को वो मानने लगे हैं आजकल ख़ुदा ।

हर दौर के उरूज़ का हासिल यही रहा
परचम बुलंद था जो कभी खाक में मिला ।

रुकता नहीं है वक़्त किसी शख़्स के लिए
तुम कौन तीसमार हो औरों से जो जुदा ।

जिसकी क़लम बिकी हो, ज़ुबाँ भी बिकी हुई
सत्ता के सामने वो भला कब हुआ खड़ा ।

जो सामने सवाल है उसका न ज़िक्र है
बातें इधर उधर की वो कब से सुना रहा ।

क़ायम है ऎतिमाद तो क़ायम है राह-ओ-रब्त
वरना तो आदमी न किसी काम का हुआ ।

’आनन’ ज़रा तू सोच में रद्द-ओ-बदल तो कर
फिर देख ज़िंदगी  कभी  होती नहीं  सज़ा ।



-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 
उरूज़ = उत्त्थान, विकास

ऎतिमाद = विश्वास , भरोसा

राह-ओ-रब्त = मेल जोल, मेल मिलाप, दोस्ती