मंगलवार, 8 मई 2012

ग़ज़ल 029[ 23 A] : सोचता हूं. इस शहर में आदमी रहता

ग़ज़ल 029[23 A] ओके

2122-----2122------2122------2122

फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन
बह्र-ए-रमल मुसम्मन सालिम
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 सोचता हूँ शहर में अब,आदमी रहता किधर है ?
बस मुखौटे ही मुखौटे जिस तरफ़ जाती नज़र है

दिल की धड़कन मर गई हो,जब मशीनी धड़कनों से
आंख में पानी नहीं है , आदमी पत्थर जिगर  है

ज़िन्दगी तो कट गई फुट्पाथ से फुटपाथ ,तक ही!
ख़्वाब तक  गिरवी रखे हैं ,कर्ज़ पे  जीवन बसर है

हो गईं नीलाम ख़ुशियां ,अहल-ए-दुनिया से गिला क्या
तीरगी हो, रोशनी हो , फ़स्ल-ए-गुल अब  बेअसर है

ख़्वाहिश-ए-उलफ़त है दिल में ,आँख में सपने हज़ारों
हासिल-ए-हस्ती यही है ,दिल हमारा दर-ब-दर है

शाम जब होने लगेगी लौट आयेंगे  परिन्दे
बस इसी उम्मीद में  ज़िन्दा खड़ा बूढ़ा शजर है

आजकल बाज़ार में क्या क्या नहीं बिकता है ’आनन’
जिस्म भी,ईमान भी ,इन्सान बिकता हर पहर है


-आनन्द पाठक









रविवार, 15 अप्रैल 2012

ग़ज़ल 028 [11 A] : झूठ की बातों को उसने --.

एक ग़ज़ल 028[11 A]--ओके

बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम 
2122---2122---2122

झूठ की बातों को उसने सत्य माना
सत्य कहने का नही अब है ज़माना

गालियाँ ही आजतक उसने है खाईं
जब भी पर्दाफ़ाश करना उसने ठाना
 
लोग बच बच कर निकलने क्यों है लगते
जब कभी वो बात करता आरिफ़ाना

अब अजायब घर की जैसे चीज कोई
नेक इन्सां का हुआ जैसे ठिकाना
 
मैं किसी को जख़्म अपने क्या दिखाऊँ
है कहाँ फ़ुरसत किसी को, क्या दिखाना
 
जब अदालत का हुआ आदिल ही बहरा
क्या करे फ़रियाद कोई, क्या सुनाना
 
सूलियों पर है टँगा हर बार ’आनन’
जब मुहब्बत का सुनाता है फ़साना ।
 


-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181











शुक्रवार, 30 मार्च 2012

गीत 41 : आना जितना आसान रहा.....

{ डायरी के पन्नों से--]


एक गीत  आना जितना आसान रहा.....


आना जितना आसान रहा
क्या जाना भी आसान ?प्रिये ! कुछ बात मेरी भी मान प्रिये !


तुम प्रकृति नटी से लगती हो इन वासन्ती परिधानों में
मधुरिम गायन के सुर पंचम घुल जाते कोयल तानों में
जितना सुन्दर ’उपमेय’ रहा ,क्या उतना ही ’उपमान’? प्रिये !
या व्यर्थ मिरा अनुमान ,प्रिये !


जब मन की आँखें चार हुई तन चन्दनवन सा महक उठा
अन्तस में ऐसी प्यास जगी आँखों मे आंसू छलक उठा
तुम जितने भी अव्यक्त रहे क्या उतने ही अनजान ?प्रिये !
फिर क्या होगी पहचान ? प्रिये !


कद से अपनी छाया लम्बी क्यों उसको ही सच मान लिया
अपने से आगे स्वयं रहे कब औरों का सम्मान किया
जितना ही सुखद उत्थान रहा क्या उतना ही अवसान ? प्रिये !
फिर काहे का अभिमान ?प्रिये !


यूँ कौन बुलाता रहता है जब खोया रहता हूँ भ्रम में
मन धीरे धीरे रम जाता जीवन के क्रम औ’अनुक्रम में
मन का बँधना आसान यहाँ ,पर खुलना कब आसान ,प्रिये !
क्या व्यर्थ रहा सब ज्ञान ,प्रिये !

आना जितना आसान रहा
क्या जाना भी आसान ?प्रिये ! कुछ बात मेरी भी मान प्रिये !


आनन्द.पाठक ’आनन’-
8800927181