शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

ग़ज़ल 198 : तेरे इश्क़ में इब्तिदा से हूँ राहिल

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ग़ज़ल 198

तेरे इश्क़ में इब्तिदा से हूँ राहिल

न तू बेख़बर है, न मैं हीं हूँ ग़ाफ़िल


ये उल्फ़त की राहें न होती हैं आसाँ

अभी और आएँगे मुश्किल मराहिल


मुहब्ब्त के दर्या में कागज की कश्ती

ये दर्या वो दर्या है जिसका न साहिल


जो पूछा कि होतीं क्या उलफ़त की रस्में

दिया रख गई वो हवा के मुक़ाबिल


इबादत में मेरे कहीं कुछ कमी थी

वगरना वो क्या थे कि होते न हासिल


अलग बात है वो न आए उतर कर

दुआओं में मेरे रहे वो भी शामिल


कभी दिल की बातें भी ’आनन’ सुना कर

यही तेरा रहबर, यही तेरा आदिल ।


-आनन्द. पाठक-


राहिल = यात्री

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2 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 18 अक्टूबर 2021 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह