शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

कविता 015 : मन बेचैन रहा करता है

 
कविता  015
 

मन बेचैन रहा करता है
न जाने क्यों ?
उचटी उचटी नींद ज़िन्दगी
इधर उधर की बातें आतीं
टूटे-फूटे सपने आते
खंड-खंड में जीवन लगता
बँटा हुआ है।
धुँधली-धुँधली, बिन्दु-बिन्दु सी
लगती मंज़िल
लेकिन कोई बिन्दु नहीं जुड़ पाता मुझसे
न जाने क्यों ।
 
एक हाथ में कुछ आता है
दूजे हाथ फिसल जाता है
रह रह कर है मन घबराता
न जाने क्यों ।
 
-आनन्द.पाठक-
 
 



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