गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

ग़ज़ल 429[03G] : ज़िंदगी इक रंज़-ओ-ग़म का सिलसिला है

 ग़ज़ल 429 [03 G]

2122---2122---2122-

फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन

बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम

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ज़िंदगी इक रंज़-ओ-ग़म का सिलसि्ला है्
यह किसी के चाहने से कब रुका है ?

वक़्त अपना वक़्त लेता है यक़ीनन
वक़्त आने पर सुनाता फ़ैसला है ।

कौन सा पल हो किसी का आख़िरी पल
हर बशर ग़ाफ़िल यहाँ , किसको पता है ।

कारवाँ का अब तो मालिक बस ख़ुदा ही
राहबर जब रहजनों से जा मिला है ।

रोशनी का नाम देकर् हर गली ,वो
अंध भक्तों को अँधेरा बेचता है ।

आप की अपनी सियासत, आप जाने
क्या हक़ीक़त है, ज़माना जानता है ।

वह अना की क़ैद से बाहर न आया
 इसलिए ख़ुद से अभी नाआशना है 

वक़्त हो तो सोचना फ़ुरसत में ’आनन’
मजहबी इन नफ़रतों से क्या मिला है ।


-आनन्द.पाठक-

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