रविवार, 15 अप्रैल 2012

ग़ज़ल 028 [11 A] : झूठ की बातों को उसने --.

एक ग़ज़ल 028[11 A]--

बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम 
2122---2122---2122

झूठ की बातों को उसने सत्य माना
सत्य कहने का नही अब है ज़माना

गालियाँ ही आजतक उसने है खाईं
जब भी पर्दाफ़ाश करना उसने ठाना
 
लोग बच बच कर निकलने क्यों है लगते
जब कभी वो बात करता आरिफ़ाना

अब अजायब घर की जैसे चीज कोई
नेक इन्सां का हुआ जैसे ठिकाना
 
मैं किसी को जख़्म अपने क्या दिखाऊँ
है कहाँ फ़ुरसत किसी को, क्या दिखाना
 
जब अदालत का हुआ आदिल ही बहरा
क्या करे फ़रियाद कोई, क्या सुनाना
 
सूलियों पर है टँगा हर बार ’आनन’
जब मुहब्बत का सुनाता है फ़साना ।
 


-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181


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शुक्रवार, 30 मार्च 2012

गीत 41 : आना जितना आसान रहा.....

{ डायरी के पन्नों से--]


एक गीत  आना जितना आसान रहा.....


आना जितना आसान रहा
क्या जाना भी आसान ?प्रिये ! कुछ बात मेरी भी मान प्रिये !


तुम प्रकृति नटी से लगती हो इन वासन्ती परिधानों में
मधुरिम गायन के सुर पंचम घुल जाते कोयल तानों में
जितना सुन्दर ’उपमेय’ रहा ,क्या उतना ही ’उपमान’? प्रिये !
या व्यर्थ मिरा अनुमान ,प्रिये !


जब मन की आँखें चार हुई तन चन्दनवन सा महक उठा
अन्तस में ऐसी प्यास जगी आँखों मे आंसू छलक उठा
तुम जितने भी अव्यक्त रहे क्या उतने ही अनजान ?प्रिये !
फिर क्या होगी पहचान ? प्रिये !


कद से अपनी छाया लम्बी क्यों उसको ही सच मान लिया
अपने से आगे स्वयं रहे कब औरों का सम्मान किया
जितना ही सुखद उत्थान रहा क्या उतना ही अवसान ? प्रिये !
फिर काहे का अभिमान ?प्रिये !


यूँ कौन बुलाता रहता है जब खोया रहता हूँ भ्रम में
मन धीरे धीरे रम जाता जीवन के क्रम औ’अनुक्रम में
मन का बँधना आसान यहाँ ,पर खुलना कब आसान ,प्रिये !
क्या व्यर्थ रहा सब ज्ञान ,प्रिये !

आना जितना आसान रहा
क्या जाना भी आसान ?प्रिये ! कुछ बात मेरी भी मान प्रिये !


आनन्द.पाठक ’आनन’-
8800927181




शुक्रवार, 23 मार्च 2012

गीत 040 : ना मैं जोगी ,ना मैं....



गीत 040 :ना मैं जोगी ,ना मैं ज्ञानी, मैं कबिरा की सीधी बानी ।

 ना मैं जोगी ,ना मैं ज्ञानी, मैं कबिरा की सीधी बानी ।

वेद पुरान में क्या लिख्खा है ,मैं अनपढ हूं ,मैं क्या जानू
दिल से दिल की राह मिलेगी मन निच्छल हो,मैं तो मानू
ये ऊँचा है, वो नीचा है , ये काला है , वो गोरा है
आंसू हो या रक्त किसी का ,एक रंग ही मैं पहचानू

जल की मछली जल में प्यासी किसने है ये रीत बनाई
ज्ञानी-ध्यानी सोच रहे हैं ’जल में नलिनी क्यों कुम्हलानी"?


मन के अन्दर ज्योति छुपी है ,क्यों न जगाता उस को बन्दे !
तुमने ही तो फेंक रखे हैं , अपने ऊपर इतने फन्दे
मन की बात सुना कर प्यारे ! अपनी सोच न गिरवी रख दे
आश्रम की तो बात अलग है , आश्रम के हैं अपने धन्धे

जिस कीचड़ में लोट रहा है ,उस कीचड़ का अन्त नहीं है
दास कबिरा कह गए साधो ," माया महा ठगिन हम जानी"


पोथी पतरा पढ़-पढ़ हारे ,जो पढ़ना था पढ न सके हम
आते-जाते जनम गँवाए  ,जो करना था कर न सके हम
मन्दिर-मस्जिद-गिरिजा झांके ,मन के अन्दर कब झांके हैं?
ख़ुद से ख़ुद की बातें करनी थी आजीवन कर न सके हम

सबकी अपनी परिभाषा है अपने अपने अर्थ लगाते -
कहत कबीरा उलट बयानी " बरसै कम्बल भींजै पानी"
ना मैं जोगी ,ना मैं......................................

आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181