ग़ज़ल 269 / 34 E
212---212---212---212
आप की बात में वो रवानी लगी
एक नदिया की जैसे कहानी लगी
एक नदिया की जैसे कहानी लगी
आप जब से हुए हैं मेरे हमसफ़र
ग़मजदा ज़िंदगी भी सुहानी लगी
आप की साफ़गोई, अदा, गुफ़तगू
कुछ नई भी लगी कुछ पुरानी लगी
छोड़ कर वो गया करते शिकवा भी क्या
उसको शायद वही शादमानी लगी
झूठ के साथ सोते हैं जगते हैं वो
सच भी बोलें कभी लन्तरानी लगी
राह सबकी अलग, सबके मज़हब अलग
एक जैसी सभी की कहानी लगी
यह फ़रेब-ए-नज़र या हक़ीक़त कहूँ
ज़िंदगी दर्द की तरज़ुमानी लगी
ज़िंदगी दर्द की तरज़ुमानी लगी
एक तू ही तो ’आनन’ है तनहा नहीं
राह-ए-उलफ़त जिसे राह-ए-फ़ानी लगी
-आनन्द पाठक -
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