बुधवार, 7 सितंबर 2022

ग़ज़ल 260 [25 E] : कुछ और सफ़ाई में ---

 ग़ज़ल 260 [25 इ]


221--1222--//221--1222


कुछ और सफ़ाई में कहता भी तो क्या कहता

दुनिया ने जो समझा है, तुमने भी वही समझा 


इलज़ाम लगाना तो आसान बहुत सबको

 उँगली तो उठाते हो, अपना न तुम्हें दिखता


करना है तुझे जो कुछ, कर अपने भरोसे पर

दुनिया की फ़क़त बातें, बातों में है क्यों उलझा


तड़्पूँ जो इधर मैं तो, वो भी न तड़प जाए

हर बार मेरे दिल में रहता है यही खटका


रखता है नज़र कोई इक ग़ैब के पर्दे  से

छुपना भी अगर चाहूँ. ख़ुद को न छुपा सकता 


माना कि भरम है सब तुम हो तो इधर हम हैं

हम-तुम न अगर होते, दुनिया में है क्या रख्खा


’आनन’ ये ज़मीं अपनी जन्नत से न कम होती।

हर शख़्स मुहब्बत की जो राह चला करता ।


-आनन्द.पाठक-


4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत बेहतरीन ग़ज़ल

Anita ने कहा…

उम्दा अश्यार

आनन्द पाठक ने कहा…

आभार आप का🙏🙏

आनन्द पाठक ने कहा…

इनायत आप की🙏🙏