मंगलवार, 13 सितंबर 2022

ग़ज़ल 265 (30E) : उनकी इशरत शादमानी

 


ग़ज़ल 265(30E)

2122---2122--212


उनकी इशरत शादमानी और है
मेरे ज़ख़्मों की निशानी और है

उनकी ग़ज़लें और ही कुछ कह रहीं 
आइने की तर्ज़ुमानी और है

जो पढ़ा इतिहास क्या है सच वही
वक़्त की अपनी कहानी और है

रोटियों की बात पर ख़ामोश हैं
झूठ की जादूबयानी और है

बात वैसे आप की तो ठीक है
दिल की लेकिन हक़-बयानी और है

जर्द पत्ते शाख़ से टूटे हुए
दर बदर की ज़िंदगानी और है

नींद क्यों तुमको अभी आने लगी 
दास्तां सुननी सुनानी और है
 
आप ’आनन’ से कभी मिलिए ज़रा
शौक़ मेरा, मेज़बानी और है।


-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ

हक़बयानी - सच्ची बात

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