सोमवार, 3 जून 2024

ग़ज़ल 386 (50F): ख़ुदा की जब इनायत हो

 ग़ज़ल 386[50F]

1222---1222---1222---1222


खुदा की जब इनायत हो बहार-ए-हुस्न आती है।

अगर दिल पाक हो तो फिर मुहब्बत ख़ुद बुलाती है ।


जुनून-ए-इश्क़ में फिरते, ख़िज़ाँ क्या है , बहारां क्या

फ़ना होना ही बस हासिल, यही दुनिया बताती है ।


नावाज़िश आप की साहिब !बहुत मश्कूर है यह दिल

बहुत मक़्रूज़ है हस्ती ,ज़ुबाँ देकर निभाती  है ।


लगा करती हैं जब जब ठोकरें, आँखें खुला करती

यही ठोकर सदा इन्सान को रस्ता दिखाती है ।


कहाँ आसान होता है गली तक यार की जाना

जो जाती है तो फिर यह ज़िंदगी कब लौट पाती है !


हवाएं साजिशें रचतीं चिरागों कॊ बुझाने की

जिगर के खून से जलती हो लौ, कब ख़ौफ़ खाती है !


यह उलफ़त की जो नदिया है अजब इसका सिफ़त ’आनन’

नहीं चढ़ना, नही चढ़ती, चढ़ी तो रुक न पाती है ।


-आनन्द.पाठक-

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