गुरुवार, 20 मार्च 2025

ग़ज़ल 435 [09- G)) लोग क्या क्या नहीं कहा करते

 ग़ज़ल 435 [09-G]

2122---1212---22


लोग क्या क्या नहीं कहा करते ,
हम भी सुन कर केअनसुना करते ।

उनके दिल को सुकून मिलता है
जख़्म वो जब मेरे हरा करते ।

ताज झुकता है, तख़्त झुकता है
इश्क़ वाले कहाँ झुका करते ।
 
कर्ज है ज़िंदगी का जो  हम पर
उम्र भर हम उसे अदा करते।

सानिहा दफ्न हो चुका कब का
कब्र क्यों खोद कर नया करते ?

जिनकी गैरत , जमीर मर जाता
चंद टुकड़ो पे वो  पला करते ।

ग़ैर से क्या करें गिला ’आनन’
अब तो अपने भी हैं दग़ा करते


-आनन्द.पाठक-


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