मंगलवार, 28 मई 2024

ग़ज़ल 380 [44F] : वह झूठ बोलता था मै

ग़ज़ल 380 [44F]

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वह झूठ बोलता था मै घबरा के रह गया
मै सच भी बोलने को था, हकला के रह गया

इस शह्र का रिवाज़ मुझे था नही पता
ऐसा जला कि हाथ मै सहला के रह गया

सुलझाने जब चला कभी हस्ती की उलझने
मै जिंदगी को और भी उलझा के रह गया

पूछा जो जिंदगी ने कभी हाल जब मेरा
दो बूँद आँसुओ की मै छलका के रह गया

डोरी तेरी तो और किसी हाथ मे रही
तू व्यर्थ अपने आप पे इतरा के रह गया

उससे उमीद था कि नई बात कुछ कहे
लेकिन पुरानी बात ही दुहरा के रह गया 

'आनन' खुली नहीं कभी आँखे तेरी जरा
खुद को खयाले खाम मे बहला के रह गया

-आनन्द पाठक-

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