शुक्रवार, 31 मई 2024

ग़ज़ल 385 [49F] : औरों की तरह हाँ में मैने हाँ नही कहा

 ग़ज़ल 385[49F]

221---2121---1221---212


औरों की तरह "हाँ’ मैने "हाँ’ नहीं कहा

शायद इसीलिए मुझे पागल समझ लिया ।


लफ़्ज़ों के ख़ल्त-मल्त से  कुछ इस तरह कहा

जुमलों में जैसे फिर से नया रंग भर दिया ।


उसके तमाम झूठ थे तारीफ़ की मिसाल

मेरे तमाम सच को वो ख़ारिज़ ही कर दिया।


वह आँख बन्द कर कभी जो ध्यान में रमा

कुछ बुदबुदाया, भीड़ ने ’मन्तर’-सा कुछ लगा।


गूँगी जमात की उसे जब बस्तियाँ दिखीं

हर बार हर चुनाव में पहले वहीं गया ।


’दिल्ली; में जा के जब कभी गद्दीनशीं हुआ

घर के ही कोयले में था ’हीरा’ उसे दिखा  ।


कितनी अज़ीब बात है सब लोग चुप रहे

’आनन’ ग़रीब था तो सरेआम लुट गया ।


-आनन्द.पाठक-

ख़्ल्त-मत = फेट-फ़ाट , गड्म-गड्ड



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