सोमवार, 20 मई 2024

ग़ज़ल 371[42F]: कितने रंग बदलता है वह

ग़ज़ल 371 [42F]

21---121---121---122


कितने रंग बदलता है, वह
ख़ुद ही ख़ुद को छलता है, वह ।

सीधी सादी राहों पर भी
टेढ़े-मेढ़े  चलता है , वह ।

जितना जड़ से कटता जाता
उतना और उछलता है, वह ।

बन्द किया है सब दरवाजे
अपने आप बहलता है, वह ।

करते हैं सब कानाफ़ूसी -
जिस भी राह निकलता है वह ।

औरों के पांवों से चलता ,
अपने पाँव न चलता है, वह।

’आनन’ की तो बात अलग है,
दीप सरीखा जलता है, वह ।


-आनन्द.पाठक-

सं 30-06-24


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