सोमवार, 20 मई 2024

ग़ज़ल 372 [43F] : शहर का उन्वान कुछ बदला हुआ है


ग़ज़ल 372 [43F]

2122---2122---2122


शहर का उन्वान कुछ बदला हुआ है
रात फिर लगता है कुछ घपला हुआ है।

लोग सहमें है , नज़र ख़ामोश है
आस्थाओं पर कहीं हमला हुआ है ?

लोग क्यों  नज़रें चुरा कर चल रहे अब,
मन का दरपन फिर कहीं धुँधला हुआ है ।

शहर के हालात कुछ अच्छे न दिखते,
मज़हबी कुछ सोच से गँदला हुआ है ।

रोशनी के नाम पर लाए अँधेरे ,
कौन सा यह रास्ता निकला हुआ है ?

मुफ़्त राशन, मुफ़्त पानी, मुफ़्त बिजली
आदमी बस झूठ से बहला हुआ है ।

आज ’आनन’ बुद्ध गाँधी की ज़रूरत
आदमी जब स्वार्थ का पुतला हुआ है ।


-आनन्द.पाठक-

सं 30-06-24


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