गुरुवार, 23 मई 2024

ग़ज़ल 375 [51A] : बेदाग़ आदमी का करें कैसे इन्तिख़ाब

 

 ग़ज़ल 375 [51-अ]   ओके

 बेदाग़ आदमी का---


बेदाग़ आदमी का करें कैसे इन्तिख़ाब 
या तो नक़ाबपोश है या फिर वो बेनिक़ाब
     
जिस आदमी की खुद की नहीं रोशनी दिखी
ग़ैरों की रोशनी से चमकता है लाजवाब ।
 
सत्ता के जोड़-तोड़ में वो बेमिसाल है
उम्मीद क्या करें कि वो लाएगा इन्क़िलाब
 
जिस आदमी की डोर किसी और हाथ में
रहता है आसमान में उड़ता हे बेहिसाब।
 
जो झूठ को भी सच की तरह बोलता रहें
ऐसे ही लोग आज हैं दुनिया में कामयाब ।
 
उसकी नज़र में पहले तो शर्म-ओ-हया भी थी
आता है सामने तो अब आता है बेहिजाब ।
 
’आनन’ जिधर भी देखिए हर शख़्स ग़मजदा
हर शख़्स की ज़ुबान पे तारी है ज़ह्रआब ।
 

-आनन्द.पाठक-

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