गुरुवार, 22 दिसंबर 2022
अनुभूतियाँ : क़िस्त 040
अनुभूतियाँ : क़िस्त 039
153
बातें सभी किताबों में हैं,
कभी सामना हुआ नहीं पर
आते रहते ख़्वाबों में हैं ।
लिखा हुआ ख़त भेज न पाया ।
लिखने की तो बात बहुत थी
लेकिन भाव सहेज न पाया ।
कुछ तो होगा रब के मन में,
रोती क्यों है निश-दिन, पगली!
अच्छा ही होगा जीवन में।
मेरी यह अनकही कहानी
सुन ले कोई अगर इसे तो
आँखों में भर आए पानी ।
-आनन्द.पाठक-
अनुभूतियाँ : क़िस्त 038
अनुभूतियाँ : क़िस्त 038 ओके
149
इतने दिन तक तुम ने मुझको
जाँचा-परखा, देखा होगा ,
कितना साथ निभा पायेगा
दिल से अपने पूछा होगा ।
150
मेरी हसरत, तेरी हसरत
बीज प्यार का छुप छुप बोती,
आगे तो अब रब की मरजी
उल्फ़त होगी या ना होगी।
151
सूनेपन में दीवारों से
बातें करती यादें सारी
मैं कुछ कहता इससे पहले
बोल उठी तसवीर तुम्हारी ।
152
दिल का दरपन तोड़ गई तुम
हुआ आइना टुकड़ा टुकड़ा
चुन चुन कर बैठा हूँ कब से
किसे सुनाऊँ अपना दुखड़ा ।
-आनन्द पाठक-
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अनुभूतियाँ : क़िस्त 037
145
भूल तुम्हारी थी या मेरी
कौन इसे अब बतलाएगा ?
बात शेष जब हो ही गई तो
व्यर्थ कोई क्या समझाएगा ?
146
फिर बहार मन के उपवन में,
पर फ़ूलों पर रंग न होगा
पहले था जैसा जीवन में ।
147
लगती है तो लग जाने दो,
चाह, तमन्ना, इश्क़, आरज़ू
धीरे धीरे जग जाने दो ।
148
तुमने दिया सहारा मुझको,
मैं तो कब का टूट चुका था
जीवन मिला दुबारा मुझको ।
-आनन्द.पाठक-
अनुभूतियाँ : क़िस्त 036
अनुभूतियाँ : क़िस्त 036 ओके
141
जो कुछ भी था पास हमारे
किया समर्पित तुम को मन से,
क्यों अर्पण स्वीकार नहीं था ?
रही शिकायत क्या पूजन से ?
142
भाव नही जब समझा तुमने
और न समझी दिल की सीरत,
उपहारों में देखी तुमने
उपहारों की क्या है कीमत ?
143
पीछे मुड़ कर क्या देखूँ मैं
बीत गया सो बीत गया अब
आशाओं की किरण सामने
राग नया है, गीत नया अब ।
144
चाहत को, एहसास, प्यार को
तुमने एक दिखावा समझा
विकल हॄदय के आर्तनाद को
तुमने एक छलावा
समझा ।
-आनन्द.पाठक-
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बुधवार, 21 दिसंबर 2022
अनुभूतियाँ : क़िस्त 035
137
क़दम क़दम पर साथ निभाना,
मेरा शुभ आशीष तुम्हें है-
उससे भी ना खेल रचाना ।
टूट गया जब एक सितारा
चाँद कहाँ सोचा करता है
टूटा किसका कहाँ सहारा
बीत गई यह सारी उमरिया
भाग दौड़ ही करते करते ,
सुबह शाम बस दिन काटा है
पाप-पुण्य से डरते डरते ।
जिस दिन लगे तुम्हें कुछ ऐसा
बहुत हो चुका साथ हमारा
उस दिन राह अलग कर लेना
कुछ न कहेगा दिल बेचारा ।
-आनन्द.पाठक-
अनुभूतियाँ : क़िस्त 034
133
आना ही जब तुम्हें नहीं है
क्यों करती रहती हो इशारे ?
134
आया है ऋतुराज का मौसम
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन,
तुम भी आ जाते- भूले से
दिल हो जाता खिल कर मधुवन ।
135
मजबूरी तो नहीं है कोई
खुला हुआ यह इक बन्धन है,
जब तुम चाहो लौट के आना
स्वागत है प्रिय ! अभिनन्दन है।
136
धरती खींच रही चन्दा को
चन्दा भी है खींचा करता
आकर्षण का सरल नियम है
इसमे कोई क्या कर सकता ?
-आनन्द.पाठक-
अनुभूतियाँ : क़िस्त 033
129
सबके साथ यही होता है,
कोई पा जाता है मंज़िल
कोई आजीवन रोता है ।
होते उसके पाँव नहीं है
सच तो चलता रहे निरन्तर
सच को मिलता छाँव नहीं है।
झूठ डगर पर हाथ मलोगी,
दोनों राह तुम्हारे सम्मुख
सोचो तुम किस राह चलोगी?
प्रश्न यही सौ बार उठा है
रिश्ता किसने तोड़ा पहले ,
इतने दिन तक साथ चली थी
फिर किसने मुँह मोड़ा पहले ।
-आनन्द.पाठक
अनुभूतियाँ: किस्त 032
अनुभूतियाँ : क़िस्त 032
125
जब से तुम हमराह हुई हो
साथ हमारे ख़ुद ही मंज़िल ,
और हमे अब क्या करना है
आगे राह भले हो मुशकिल ।
126
’और मिल गया होगा कोई’
सोचा तुमने, कैसे सोचा ?
मन में तुम्हारे क्यों दुविधा है?
मुझ पर क्या अब नहीं भरोसा ?.
127
लटें तुम्हारी छू कर आते
प्रात-समीरण गाते सरगम,
पूछ रहीं हैं कलियाँ कलियाँ
बेमौसम क्यों आया मौसम ?
128
पास भी आकर दूर हो गया
दिल ने जिसको चाहा हरदम
जाने किसकी नज़र लगी थी
जाने कैसा था वह जानम !
-आनन्द.पाठक-
x
अनुभूतियाँ : क़िस्त 031
अनुभूतियाँ 031 ओके
121
अंगारों को गठरी में रख
बाँध सका है कौन आजतक ?
दो-धारी तलवार प्यार की
साध सका है कौन आजतक ?
122
आज खड़ा हूँ दोराहे पर
दोनों ही राहों में उलझन ,
एक राह में सुखद कल्पना
दूजी राह व्यथित रहता मन ।
123
मेरी चाहत एक दिखावा
कह कर तुम ने किया किनारा ,
शायद तुमने देखा ना हो
जीता कैसे दिल बेचारा ।
124
साथ अगर तुम छोड़ न दोगी
साथ तुम्हारे चल सकता हूँ ,
और किसी को चाहूँ, तौबा
तुमको नही बदल सकता हूँ ।
-आनन्द.पाठक-
रविवार, 18 दिसंबर 2022
अनुभूतियाँ : क़िस्त 030
अनुभूतियाँ 030 ओके
117
राहगुज़र जो नहीं तुम्हारी
राह हमारे लिए व्यर्थ है ,
अगर सफ़र में साथ नहीं तुम
सफ़र हमारा, बिना अर्थ है ।
118
ॠषिवर, मुनिवर, ज्ञानी, ध्यानी
बात यही सब समझाते हैं
कर्म तुम्हारा, नियति तुम्हारी
दोनों अलग अलग बातें हैं
119
पहले ही मालूम मुझे था
अपनी सीमाएँ मजबूरी
सफ़र शुरू होने से पहले
तुमने स्वयं बना ली दूरी ।
120
सूरज चढ़ता सुबह अगर तो
शाम शाम तक ढलना ही है,
समय चक्र है घूमा करता
मौसम यहाँ बदलना ही है ।
-आनन्द.पाठक-
x
अनुभूतियाँ : क़िस्त 029
अनुभूतियाँ 029 ओके
113
दिल तो है आवारा बादल
इधर उधर फिरता रहता है,
प्यासी धरती दिखी कहीं तो
जल प्लावन करता रहता है ।
114
सोच रहा हूँ लोग यहाँ क्यों
चेहरे बदल बदल कर मिलते
ऊपर से तो सहज दिखे हैं
भीतर भीतर चालें चलते ।
115
वक़्त इधर क्या बदला मेरा
लोगों ने भी आँखें फेरी,
कलतक आँखों की पुतली थे
आज उन्होने आँख तरेरी ।
116
रब ने दिया बहुत कुछ सबको
परबत, घाटी, गुलशन, झरना ,
लेकिन साथ नहीं हो जब तुम
तो फिर क्या इन सबका करना ।
-आनन्द.पाठक-
x
अनुभूतियाँ : क़िस्त 028
अनुभूतियाँ : क़िस्त 028 ओके
109
हाथ बढ़ा कर छूते कैसे
हाथ हमारे कटे हुए थे.
मिलते भी तो क्या देते हम
वक़्त के हाथों लुटे हुए थे ।
110
बात तुम्हारी नहीं है, जानम !
बात ज़माने की, सब की है ?
प्रेम कहानी सबकी यक-सा
तुमने ही क्यों दिल पर ली है?
111
मेरी ख़ुशियों में रहती है
दुनिया भर की साझेदारी
पर जब अपना ग़म होता है
ढोने की होती लाचारी ।
112
छोड़ गई पूजा की थाली
बिखर गए सब पत्रम-पुष्पम ,
कब तक रहूँ प्रतीक्षारत मै
तुम्हीं बता दो मेरे प्रियतम !
-आनन्द.पाठक-
x
अनुभूतियाँ : क़िस्त 027
अनुभूतियाँ : क़िस्त 027 ओके
105
मौन किसी का समझा, मैने
स्वप्न मेरा साकार हुआ है,
एक भरम था वह भी मेरा
अर्पण कब स्वीकार हुआ है ।
106
राह अलग जब चलना ही था
साथ चली फिर क्यों इतने दिन ?
एक भुलावा था, जाने दो
कितना जीना है अब तुम बिन ।
107
तुम ने भी तो देखा होगा
आँधी, तूफ़ाँ, बिजली, पानी,
तोड़ सकीं हैं कब ये हमको
जीने की जब हमने ठानी ।
108
कभी
कभी जब अँधियारे में
दिख
जाती है एक रोशनी
मानॊ
मुझको बुला रही हो
फिर
जीने को नई ज़िंदगी ।
-आनन्द.पाठक-
x
अनुभूतियाँ : क़िस्त 026
अनुभूतियाँ : क़िस्त 026 ओके
101
आँख खुली तो देखा मैने
बात कहाँ से कहाँ बढ़ गई ।
मैं सपनॊ में खोया खोया
धूप कहाँ से कहाँ चढ़ गई
102
फेर लिया मुँह तुमने जिससे
कौन भला उसको अपनाए ,
इधर उधर कब तक भटकेगा
शाम ढलेगी लौट कर आए।
103
जीवन की अब शाम हुई है
सुधियों के कुछ दीप जले हैं,
व्यस्त रहे हम भाग दौड़ में
यादों से हम आज मिले हैं ।
104
शाम हुई अब तो घर आ जा
थका हुआ होगा दिन भर का,
कितनी खोंच लगा दी तू ने
हाल किया क्या इस चादर का ।
-आनन्द पाठक-
x
मुक्तक 07: 05डी मौसम बदलेगा से
कोई हफ़्तों न करे बात, कोई बात नहीं
आप दो पल न करें बात तो डर लगता है
दिल-ए-वीरान में अब कौन इधर आता है
आप आते हैं तो वीरान भी घर लगता है
:2:
दर्द-ए-हस्ती है मुख़्तसर भी नहीं
ख़त्म होने को ये सफ़र भी नहीं
रंग मुझ पर चढ़ा मुहब्बत का
और इसकी मुझे ख़बर भॊ नहीं
;3:
तुम्हारी गली से निकल कर जो आया
ये दुनिया न भायी , न ख़ुद को मैं भाया
अजब सा नशा चढ़ गया है जो मुझ पर
न उतरे कभी ज़िंदगी भर ख़ुदाया !
:4:
आप से जब मिले हम सफल हो गए
रास्ते ज़िंदगी के सरल हो गए
दर्द उड़ते रहे बादलों की तरह
आँसुओं में ढले तो ग़ज़ल हो गए
-आनन्द.पाठक-
मुक्तक 06 :03 डी मौसम बदलेगा से
:1:
जो होंठो पर रही बातें, दबा कर रह गई तुम भी
ये मेरा क्या कि तनहा था कि तनहा ही रहूँगा मैं
जगे थे दर्द जो दिल में सुला कर रह गई तुम भी
:2:
आस्माँ देखते ना चला कीजिए
ठोकरों से ज़मीं पर बचा कीजिए
ज़िंदगी का सफ़र एक लम्बा सफ़र
हर क़दम सोच कर ही रखा कीजिए
:3:
कभी कभी तो डर लगता है कैसे प्यार सँभालूँगा मैं
इतना प्यार जो तुम करती हि कैसे कर्ज उतारूँगा मैं
देख रहा हूँ ख़्वाब अभी से आने वाले कल की जानम
इन्शा अल्लाह इक दिन तुमको पलकों पर बैठा लूंगा मैं
;4:
कुरबत ने कुछ तो दिल में उम्मीद है जगाई
आए थे ख़्वाब रंगी ,ना नींद आज आई
जाने किधर को लेकर जाएगा दिल दिवाना
यह कैसी तिश्नगी है ये कैसी आशनाई
-आनन्द.पाठक-
मुक्तक 05 : 02डी मौसम बदलेगा से
चन्द लमहे भी क्या हसीं होते
आप मेरे जो हमनशीं होते
ज़िंदगी और भी संवर जाती
आप दिल के अगर मकीं होते
:2:
दीप उम्मीद का इक जलाए रखा
उनके स्वागत में पलकें बिछाए रखा
वो न आएँ न आएँ भले उम्र भर
इक मिलन का भरम था बनाए रखा
:3:
यह चमन है हमारा, तुम्हारा भी है
ख़ून देकर सभी ने सँवारा भी है
कौन है जो हवा में ज़ह्र घोलता
कौन है जो दुश्मन का प्यारा भी है
;4:
बात क्या थी जो मुझसे छुपाई गई
जो सर-ए-बज़्म सबको बताई गई
कुछ भी कहने की मुझको इजाज़त नहीं
सिर्फ़ मुझ पर ही बन्दिश लगाई गई
-आनन्द.पाठक-
गुरुवार, 15 दिसंबर 2022
ग़ज़ल 287[52इ] : काम जो भी जब करो अच्छा करो
2122---2122--212
काम जो भी जब करो अच्छा करो
लोग रख्खें याद कुछ ऐसा करो
कौन देता है किसी को रास्ता
ख़ुद नया इक रास्ता पैदा करो
भीड़ सड़कों पर उतर कर आ गई
इन हवाओं को जरा समझा करो
आस्माँ तक हैं तुम्हारी सीढ़ियाँ
बात लम्बी यूँ न तुम फेंका करो
रोशनी के नाम पर तुम शहर में
यूँ अँधेरें से न समझौता करो
लोग अन्दर तक बहुत टूटे हुए-
उनके चेहरों की खुशी जिंदा करो
लोग प्यासे हैं खड़े 'आनन' यहाँ
इक नदी लेकर इधर आया करो
-आनन्द.पाठक-
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022
ग़ज़ल 286[51इ] : बनाया है जैसा, मै वैसा बना हूँ
एक ग़ज़ल 286/51
122---122---122---122
बनाया है जैसा, मैं वैसा बना हूँ
भला हूँ, बुरा हूँ , मगर आप का हूँ
मेरे आब-ओ-गिल में कमी तो नही थी
गुनाहों का फिर क्यों मैं पुतला बना हूँ
इलाही मेरा शौक़ क्या आजमाना
अज़िय्यत में भी आप से बावफ़ा हूँ
बलायें, मसाइब सब अपनी जगह हैं
मैं अपने मुक़ाबिल हूँ ख़ुद से लड़ा हूँ
मैं टूटा हुआ शाख से एक पत्ता
इधर से उधर मै भटकता रहा हूँ
चराग़-ए-मुहब्बत जलाया किसी ने
नवाज़िश है जिसकी, उसे ढूँढता हूँ
मैं ’आनन’ कि माना नमाज़ी नहीं हूँ
मगर आप का मैं रहा आशना हूँ
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
आब -ओ--गिल = मिट्टी पानी[ ऐसा माना गया कि ख़ुदा ने आदमी कोआब-ओ-गिल से बनाया]
बज़ाहिर = जो ज़ाहिर है ,जो दिख रहा है ,
अज़िय्यत में =शारीरिक कष्ट,मानसिक कष्ट ,यातना में
आशना = चाहने वाला
मंगलवार, 6 दिसंबर 2022
ग़ज़ल 285 [50E]: छुपे थे जो दरिंदे दिल में---
ग़ज़ल 285[50E] [ श्रद्धा हत्याकाण्ड पर -------
---ख़ला से आती एक आवाज़ ]
1222--1222--1222--1222
छुपे थे जो दरिंदे दिल में ,उसके जब जगे होंगे
कटा जब जिस्म होगा तो नहीं आँसू बहे होंगे
न माथे पर शिकन उसके, नदामत भी न आँखों में
कहानी झूठ की होगी, बहाने सौ नए होंगे
हवस थी या मुहब्बत थी छलावा था अदावत थी
भरोसे का किया है खून, दामन पर लगे होंगे
कटारी थी? कुल्हाड़ी थी? कि आरी थी? तुम्हीं जानॊ
तड़प कर प्यार के रंग-ए-वफा पहले मरे होंगे
हमारा सर, हमारे हाथ तुमने काट कर सारे
सजा कर "डीप फ़ीजर" मे करीने से रखे होंगे
लहू जब पूछता होगा. सिला कैसा दिया तुमने
कटी कुछ ’बोटियाँ’ तुमने वहीं लाकर धरे होंगे
तुम्हारे दौर की यह तर्बियत कैसी? कहो ’आनन’ !
उसे ’पैतीस टुकड़े’ भी बदन के कम लगे होंगे
-आनन्द.पाठक-
[ नोट ; लीविंग रिलेशन में रह रही 27 साल की एक लड़की श्रद्धा -वालकर-- की हत्या उसके लीविंग पार्टनर ने कर दी और जिस्म के ’पैतीस [35] टुकड़े" कर सबूत मिटाने की नीयत से गुरुग्राम के जंगलों में फ़ेंक दिया ।
शब्दार्थ
ख़ला से = शून्य से
तर्बियत = परवरिश ,संस्कार
मंगलवार, 29 नवंबर 2022
गीत 76: कौन यह निर्णय करेगा --
2122---2122--2122
कौन यह निर्णय करेगा ?
कौन किसको दे गया है वेदनाएँ ।
कल तलक थे एक दूजे के लिए हम
अब न वो छाया, न वो परछाइयाँ हैं
वक़्त ने कुछ खेल ऐसा कर दिया है
एक मैं हूँ साथ में तनहाइयाँ हैं ।
कौन सुनता है किसी की,
ढो रहे हैं सब यहाँ अपनी व्यथाएँ
हर तुम्हारी शर्त को मैने निभाया
जो कहा तुमने वो मैने गीत गाया
बादलों के पंख पर संदेश भेंजे-
आजतक उत्तर मगर कोई न आया ।
क्या कमी पूजन विधा में-
क्यों नहीं स्वीकार होती अर्चनाएँ?
साथ रहने की सुखद अनुभूतियाँ थीं
याचना थी, चाहतें थीं. कल्पना थी
ज़िंदगी के कुछ सपन थे जग गए थे
प्रेम में था इक समर्पण, वन्दना थी।
कल तलक था मान्य सब कुछ
आज सारी हो गईं क्यों वर्जनाएँ ?
चाँद से भी रूठती है चाँदनी क्या !
फूल से कब रूठती है गंध प्यारी !
कुछ अधूरे स्वप्न है तुमको बुलाते
मान जाओ, भूल जाओ बात सारी
कह रहा है मन हमारा
लौट आने की अभी संभावनाएँ
कौन यह निर्णय करेगा .कौन किसको दे गया है वेदनाएँ ?
-आनन्द.पाठक-
बुधवार, 9 नवंबर 2022
ग़ज़ल 284 [49इ]: बन के साया चल रहा था हमक़दम
ग़ज़ल 284[49इ]
2122--2122--212
बन के साया चल रहा था हमक़दम
’अलविदा’ कह कर गया मेरा सनम
वक़्त देता ज़ख़्म हर इनसान को
वक़्त ही भरता रहेगा दम ब दम
बोझ यह हल्का लगेगा दिन ब दिन
हौसले से जब रखोगे हर क़दम
बोझ अपना ख़ुद उठाना उम्र भर
सिर्फ़ लफ़्ज़ों से नहीं होते हैं कम
ज़िन्दगी आसान तो होती नहीं
रहगुज़र में सैकड़ॊं हैं पेंच-ओ-ख़म
फ़लसफ़े की बात है अपनी जगह
बाँटता है कौन किसका दर्द-ओ- ग़म
जानता है तू भी ’आनन’ सत्य क्या
बेसबब क्यों कर रहा है चश्म-ए-नम?
-आनन्द.पाठक
मंगलवार, 8 नवंबर 2022
ग़ज़ल 283[48इ] : आप से है एक रिश्ता जाविदाँ
ग़ज़ल 283[48इ]
2122---2122---212
आप से है एक रिश्ता जाविदाँ
एक क़तरा और बह्र-ए-बेकराँ
राजमहलों की हकीकत एक सी
वक़्त के हाथों मिटा नाम-ओ-निशाँ
छोड़ कर जाना तेरी महफिल, हमे
वक़्त सबका है मुक़र्रर जब यहाँ
और भी दुनिया में हैं तेरी तरह
एक तू ही तो नहीं है सरगिराँ
चाहतों में ही उलझ कर रह गई
हर बशर की नामुकम्मल दास्ताँ
संग-ए-दिल भी चीख उठता देख कर
जब उजड़ता है किसी का आशियाँ
वह ज़माना अब कहाँ ’आनन’ रहा
ज़ाँ-ब लब तक जब निभाते थे ज़बाँ
-आनन्द.पाठक-
जाविदाँ = नित्य, शाश्वत,अनश्वर
बह्र-ए-बेकराँ = असीम सागर
सरगिराँ =नाख़ुश ,अप्रसन्न
ज़ाँ ब लब तक = अन्तिम अन्तिम समय तक [ मृत्यु काल तक]
रविवार, 6 नवंबर 2022
ग़ज़ल 282[47इ] : प्यार में होता नहीं सूद-ओ-ज़ियाँ
ग़ज़ल 282/47
2122--2122--212
प्यार में होता नहीं सूद-ओ-ज़ियाँ
वक़्त लेता हर क़दम पर इम्तिहाँ
आँख करती आँख से जब गुफ़्तगू
आँख पढ़ती आँख का हर्फ़-ए-बयाँ
इक मुकम्मल दास्तान-ए-ग़म कभी
अश्क की दो बूँद में होती निहाँ
कौन सा रिश्ता है जो टूटा नहीं
शक रहा जब दो दिलों के दरमियाँ
वस्ल की सूरत निकल ही आएगी
मैं तुम्हारी हूँ जमीं, तुम आसमाँ
ज़िंदगी रंगीन भी आती नज़र
देखते जब आप इसमें ख़ूबियाँ
लोग हैं अपने मसाइल में फ़ँसे
कौन सुनता है किसी की दास्ताँ
इश्क़ में ’आनन’ अभी नौ-मश्क़ हो
हार कर ही जीत मिलती हैं यहाँ
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
सूद-ओ-ज़ियां = हानि-लाभ
निहाँ = छुपा हुआ
वस्ल = मिलन
मसाइल =मसले.समस्यायें
नौ-मश्क़ = नए नए अनाड़ी
गुरुवार, 3 नवंबर 2022
ग़ज़ल 281[46इ] : याद में यार की मैं रहा
ग़ज़ल 281(46E)
212--212--212--212
याद में यार की मै रहा मुब्तिला
कौन आया गया यह न मुझको पता
इश्क आवाज़ देता न जो हुस्न को
क्या न होती ये तौहीन-ए-हुस्न-ओ-अदा ?
बारहा कौन करता इशारा मुझे
ग़ैब से कौन देता है मुझको सदा
मैने चाहा कि अपना बना लूँ उसे
ज़िन्दगी से रहा बेसबब फ़ासला
एक क़तरे में तूफ़ाँ का इमकान है
वक़्त आने दे फिर देख होता है क्या
मैकदा भी यहीं और मसजिद यहीं
और दोनो में है एक सा ही नशा
ख़ुद के अन्दर नहीं ढूँढ पाया जिसे
फिर तू दैर-ओ-हरम में किसे ढूँढता ?
राह-ए-उल्फ़त में होना फ़ना जब नहीं
क्या समझ कर तू ’आनन’ इधर आ गया?
-आनन्द.पाठक-
बुधवार, 2 नवंबर 2022
ग़ज़ल 280[45इ] : भूल पाया जिसे उम्र भर भी नहीं
ग़ज़ल 280[45 इ]
212--212--212--212
भूल पाया उसे उम्र भर भी नहीं
जिसने देखा मुझे इक नज़र भी नहीं
धूल चेहरे पे उसके जमी है मगर
हैफ़! इसकी उसे कुछ ख़बर भी नहीं
आस ले कर हूँ बैठा उसी राह पर
जो कभी उसकी यह रहगुज़र भी नहीं
मेरी बातों को सुन, अनसुना कर दिया
या ख़ुदा ! उस पे होता असर भी नहीं
मैं सुनाऊँ भी क्या और किस बाब से
दास्ताँ अपनी है मुख़्तसर भी नहीं
एक दीपक अकेला रहा जूझता
अब हवाओ से लगता है डर भी नहीं
जो ख़यालों में मेरे हमेशा रहा
आजकल हमसुखन हमसफ़र भी नहीं
जिस्म-ए-फ़ानी को ’आनन’ जो समझा था घर
वक़्त-ए-आख़िर रहा तेरा घर भी नहीं
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
हैफ़ ! = अफ़सोस
बाब = अध्याय [ Chapter,]
मुख़्तसर = संक्षेप [ in short ]
जिस्म-ए-फ़ानी = नश्वर शरीर
वक़्त-ए-आख़िर = अन्त समय में
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022
ग़ज़ल 279 [44इ] : समझना ही न चाहो तुम--
ग़ज़ल 279/44
1222---1222---1222---1222
समझना ही न चाहो तुम, कहाँ तक तुमको समझाते
हम अपनी बेगुनाही की कसम कितनी भला खाते
तुम्हे फ़ुरसत नहीं मिलती कभी ख़ुद की नुमाइश से
हक़ीक़त सब समझते हैं, ज़रा तुम भी समझ जाते
समन्दर ने डुबोया है मेरी कश्ती किनारे पर
तमाशा देखने तुम भी किनारे तक चले आते
बहुत सी बात ऐसी है कि अपना बस नहीं चलता
फ़साना बेबसी का काश! हम तुमको सुना पाते
अगर दिल साफ़ यह होता नशे में झूमते रहते
जिधर हम देखते तुमको, उधर तुम ही नज़र आते
बहुत लोगो ने समझाया कि उनके रास्ते बेहतर
मगर यह छोड़ कर राह-ए-मुहब्बत हम कहाँ जाते
बहुत आसान होता है उठाना उँगलियाँ ’आनन’
खुशी होती अगर तुम खुद जो कद अपना बढ़ा पाते
-आनन्द पाठक-
शनिवार, 22 अक्टूबर 2022
मुक्तक 08 : 01E : दीपावली पर-क़लम का सफ़र से
:1:
पर्व दीपावली का मनाते चलें
प्यार सबके दिलों में जगाते चलें
ये अँधेरे हैं इतने घने भी नहीं
हौसलों से दि्ये हम जलाते चलें
:2:
आग नफ़रत की अपनी मिटा तो सही
तीरगी अपने दिल की हटा तो सही
इन चराग़ों की जलती हुई रोशनी
राह दुनिया को मिल कर दिखा तो सही
:3:
कर के कितने जतन प्रेम के रंग भर
अल्पनाएँ सजा कर खड़ी द्वार पर
एक सजनी जला कर दिया साध का
राह ’साजन’ की तकती रही रात भर
:4:
प्रीति के स्नेह से प्राण-बाती जले
दो दिये जल रहे हैं गगन के तले
लिख रहें हैं कहानी नए दौर की
हाथ में हाथ डाले सफ़र पर चले
:5:
घर के आँगन में पहले जलाना दिये
फिर मुँडेरों पे उनको सजाना. प्रिये !
राह सबको दिखाते रहें दीप ये-
हर समय रोशनी का ख़जाना लिए ।
-आनन्द पाठक-
गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022
ग़ज़ल 278[43ई] : अमानत में करते नहीं हम --
ग़ज़ल 278
122---122---122---122
अमानत में करते नहीं हम ख़यानत
न छोड़ी कभी हमने अपनी शराफ़त
रही चार दिन की मेरी पारसाई
गई ना मगर बुतपरस्ती की आदत
समझ जाएगा एक दिन वो यक़ीनन
मेरी बेबसी की अधूरी हिक़ायत
क़फ़स में अभी मुझको जीना न आया
ये दिल करता रहता हमेशा बग़ावत
उमीदों पे क़ायम है दुनिया हमारी
कभी होगी हासिल तुम्हारी क़राबत
वही दास्तान-ए-फ़ना ज़िंदगी के
हमेशा ही रहता है फिक्र-ए- क़यामत
भले तुम रहो लाख सजदे में ’आनन’
लगी लौ न दिल में तो फिर क्या इबादत
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
पारसाई = संयम, इंद्रिय निग्रह
हिक़ायत = कहानी
ग़ज़ल 277 [42ई] : छोड़ दूँ मैं शराफ़त यह फ़ितरत नहीं
ग़ज़ल 277[ 42 ई]
212---212---212---212
छोड़ दूँ मैं शराफ़त यह फ़ितरत नहीं
सर कहीं भी झुका दूँ, ये आदत नहीं
आप से मैं मिलूँ तो मिलूँ किस तरह
आप की सोच में अब सदाक़त नहीं
हौसले इन चरागों में भरपूर हैं
तोड़ सकती हवाएँ ये ताक़त नहीं
आइना देख कर तुम करोगे भी क्या
तुमको होनी तो कोई नदामत नहीं
दिल में कुछ और है, ज़ाहिरन और कुछ
यह दिखावा है, कोई रफ़ाक़त नहीं
जाने क्यों वह ख़फ़ा है बिना बात का
आजकल होती उसकी इनायत नहीं
सब तुम्हारे मुताबिक़ हो ’आनन’ यहाँ
अहले दुनिया की ऐसी रिवायत नहीं ।
-आनन्द.पाठक-
नदामत = प्रायश्चित अफ़सोस
बुधवार, 12 अक्टूबर 2022
ग़ज़ल 276 [41इ] : शाख से पत्तियाँ टूट कर
ग़ज़ल 276 [41इ]
212--212--212
शाख से पत्तियाँ टूट कर
उड़ गई हैं न जाने किधर
जब मिलन के लिए चल पड़ी
फिर न लौटी नदी अपने घर
चार दिन की खुशी के लिए
दौड़ते ही रहे उम्र भर
एक पल का ग़लत फ़ैसला
कर गया ज़िंदगी दर बदर
आशियाने परिंदो के थे-
अब न आँगन में है वो शजर
इक नज़र भर तुम्हें देख लूँ
ज़िंदगी एक पल तो ठहर
बात बरसों की सब कर रहे
अगले पल की न कोई ख़बर
तुमको ’आनन’ पता क्या नहीं
इश्क का है सफ़र पुरख़तर
-आनन्द.पाठक-
ग़ज़ल 275 [ 40इ] : वह अपने आप पर झुँझला रहा है
ग़ज़ल 275
1222---1222---122
वह अपने आप पर झुँझला रहा है
कोई उसका उजाला खा रहा है
समय रहता हमेशा एक सा कब
इशारों में समय समझा रहा है
ये लहजा आप का लगता नहीं है
कोई है, आप से बुलवा रहा है
चमन की तो हवा ऐसी नहीं थी
फ़ज़ा में ज़ह्र भरता जा रहा है
भले मानो न मानो सच यही है
पस-ए-पर्दा कोई भड़का रहा है
वो देता लाख अपनी है सफ़ाई
भरोसा क्यों नहीं हो पा रहा है
जिसे अपना समझते हो तुम ’आनन’
तुम्हारे काम कब वो आ रहा है
-आनन्द. पाठक--
पस-ए-पर्दा = पर्दे के पीछे से
रविवार, 9 अक्टूबर 2022
ग़ज़ल 274 [39 ई] :चढ़ते दर्या को इक दिन है जाना उतर
ग़ज़ल 274[39 E]
212--212--212--212
चढ़ते दर्या को इक दिन है जाना उतर
जान कर भी तू अनजान है बेख़बर
प्यार मे हम हुए मुब्तिला इस तरह
बेखुदी मे न मिलती है अपनी खबर
यूँ ही साहिल पे आते नहीं खुद ब खुद
डूब कर ही कोई एक लाता गुहर
या ख़ुदा ! यार मेरा सलामत रहे
ये बलाएँ कहीं मुड़ न जाएं उधर
अब न ताक़त रही, बस है चाहत बची
आ भी जाओ तुम्हे देख लूँ इक नज़र
ये बहारें, फ़ज़ा, ये घटा, ये चमन
है बज़ाहिर उसी का कमाल-ए-हुनर
उसकॊ देखा नहीं, बस ख़यालात में
सबने देखा उसे अपनी अपनी नजर
खुल के जीना भी है एक तर्ज-ए-अमल
आजमाना कभी देखना फिर असर
ज़िंदगी से परेशां हो ’आनन’ बहुत
क्या कभी तुमने ली ज़िंदगी की खबर ?
-आनन्द.पाठक-
शनिवार, 8 अक्टूबर 2022
ग़ज़ल 273[38E]: तहत पर्दे के इक पर्दा मिलेगा
ग़ज़ल 273 [38E]
1222---1222---122
तहत पर्दे के इक पर्दा मिलेगा
अगर सोचूँ तो हमसाया मिलेगा
कहाँ तुम साफ़ चेहरा ढूँढत्ते हो
यहाँ सबका रंगा चेहरा मिलेगा
तलब बुझती नहीं है लाख चाहें
हमारा दिल तुम्हें प्यासा मिलेगा
भले ही भीड़ में दिखता तुम्हें है
मगर अन्दर से वह तनहा मिलेगा
हवाएँ ख़ौफ़ का मंज़र दिखाती
चमन का बाग़बाँ सहमा मिलेगा
शजर को डालियाँ कब बोझ लगती
वो अपने रंग में गाता मिलेगा
छुपा कर रंज़ो-ग़म रखता है दिल में
मगर ’आनन’ तुम्हें हँसता मिलेगा
-आनन्द.पाठक-
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022
ग़ज़ल 272 [37इ] : ज़िंदगी रंग क्या क्या दिखाने लगी
ग़ज़ल 272 /37इ
212---212---212---212
बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम
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ज़िंदगी रंग क्या क्या दिखाने लगी
आँख नम थी मगर मुस्कराने लगी
यक ब यक उसके रुख से जो पर्दा उठा
रूबरू हो गई मुँह छुपाने लगी
सामने जब मैं उनको नज़र में रखा
फिर ये दुनिया नजर साफ आने लगी
बागबाँ की नज़र, बदनज़र हो गई
हर कली बाग़ की खौफ़ खाने लगी
मैं बनाने चला जब नया आशियाँ
बर्क़-ए-ख़िरमन मुझे क्यों डराने लगी ?
आप की जब से मुझ पर इनायत हुई
ज़िंदगी तब मुझे रास आने लगी
तुमको ’आनन’ कहाँ की हवा लग गई
जो ज़ुबाँ झूठ को सच बताने लगी ।
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
बर्क़-ए-ख़िरमन = आकाशीय बिजली
जो खलिहान तक जला दे
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022
ग़ज़ल 271 [ 36इ]: इक अजब अनजान सा रहता है डर
ग़ज़ल 271/36 ई
2122---2122--212
इक अजब अनजान सा रहता है डर
आजकल मिलती नहीं उसकी ख़बर
लौट आएँगे परिन्दे शाम तक -
मुन्तज़िर है आज भी बूढ़ा शजर
देश की माटी हमारी ख़ास है
ज़र्रा ज़र्रा है वतन का सीम-ओ-ज़र
पत्थरों के शहर में शीशागरी
कब तलक क़ायम रहेगा यह हुनर
दास्तान-ए-दर्द तो लम्बी रही
और ख़ुशियों की कहानी मुख़्तसर
उलझने हों, पेच-ओ-ख़म हो या बला
काटना होगा तुम्हें ही यह सफ़र
सब्र कर ’आनन’ कभी वो आएगा
तेरी आहों का अगर होगा असर
-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
मुन्तज़िर = इन्तज़ार में
सीम-ओ-ज़र =चाँदी-सोना ,धन दौलत
शीशागरी = शीशे /कांच का काम
पेच-ओ-ख़म = मोड़ घुमाव
मंगलवार, 27 सितंबर 2022
ग़ज़ल 270 [35 E] : तू उतना ही चलेगा---
1222---1222--1222---1222
मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
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भरेगा चाबियाँ उतनी तू जितना नाच पाएगा ।
शनिवार, 24 सितंबर 2022
ग़ज़ल 269 [34 E]: आप की बात में वो रवानी लगी
ग़ज़ल 269 / 34 E
212---212---212---212
आप की बात में वो रवानी लगी
एक नदिया की जैसे कहानी लगी
आप जब से हुए हैं मेरे हमसफ़र
ग़मजदा ज़िंदगी भी सुहानी लगी
आप की साफ़गोई, अदा, गुफ़तगू
कुछ नई भी लगी कुछ पुरानी लगी
छोड़ कर वो गया करते शिकवा भी क्या
उसको शायद वही शादमानी लगी
झूठ के साथ सोते हैं जगते हैं वो
सच भी बोलें कभी लन्तरानी लगी
राह सबकी अलग, सबके मज़हब अलग
एक जैसी सभी की कहानी लगी
यह फ़रेब-ए-नज़र या हक़ीक़त कहूँ
ज़िंदगी दर्द की तरज़ुमानी लगी
एक तू ही तो ’आनन’ है तनहा नहीं
राह-ए-उलफ़त जिसे राह-ए-फ़ानी लगी
-आनन्द पाठक -